विद्यापति गीत संग्रह · शिव भजन

हे हर हमर करहु कृपाला

महाकवि विद्यापति रचित शिव-भक्ति पद — संसार के माया जाल में बँधे मन की पुकार, भोलेनाथ से करुणा और शरण की याचना

🔱 रचनाकार — महाकवि विद्यापति, मिथिला
ॐ नमः शिवाय

जटा में चंद्रमा और गंगा, कंठ में सर्प, हाथ में त्रिशूल-डमरू — करुणामय भोलेनाथ का मैथिल शैली में चित्रण

हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला — पूरा मैथिली पद

महेशवाणी · विद्यापति

हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला,
सब विधि बाझलहुँ माया जाला।

बीति वयस दिउ पन मोर,
बीति वयस दिउ पा मोर।
धयल सरण चढ़ि मातल मोर,
हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला,
सब विधि बाझलहुँ माया जाला।

एक बेर हर हमरा उर हेरे,
एक बेर हर हमरा उर हेरे।
पारबती बस दारिद्र फेरू,
हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला,
सब विधि बाझलहुँ माया जाला।

भनहि विद्यापति तोहर आस शिव,
भनहि विद्यापति तोहर आस शिव।
देव नेह देखु राखि अपने पास,
हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला,
सब विधि बाझलहुँ माया जाला।

नोट: मैथिली के लोक एवं कंठस्थ गायन में कुछ पंक्तियों के शब्द-रूप में क्षेत्रीय अंतर मिल सकता है।

🎵 हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला — वीडियो

हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला

“हे हर हमर करहूँ प्रतिपाला, सब विधि बाझलहुँ माया जाला” महेशवाणी परंपरा से जुड़ा एक प्रसिद्ध मैथिली शिव-भक्ति पद है। इस वीडियो में इसकी लोकप्रिय संगीत प्रस्तुति सुनी जा सकती है।

🎤 गायक अविनाश करन
✍️ गीत / रचना Mahakavi Vidhyapati
🕉️ भाषा मैथिली
🔱 विषय भगवान शिव की भक्ति

उपलब्ध ऑनलाइन ट्रैक जानकारी में इस प्रस्तुति के गायक के रूप में उदित नारायण और गीत/रचना के लिए परमहंस लक्ष्मीनाथ गोसाईं का उल्लेख मिलता है।

🔱 विद्यापति · महेशवाणी · शिव भजन

“हे हर हमर करहु कृपाला” में भक्त अपने जीवन की थकान, माया के बंधन और अंततः भगवान शिव की शरण में लौटने की पुकार व्यक्त करता है। नीचे आपको पूरा मैथिली पद, उसका सरल भावार्थ, शब्दों का अर्थ और इस भजन की लोकप्रिय प्रस्तुति एक ही जगह मिलेगी।

पद परिचय

"हे हर हमर करहु कृपाला" महाकवि विद्यापति ठाकुर द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय शिव-भक्ति पद है, जो मिथिला की महेशवाणी परंपरा — अर्थात शिव को समर्पित भक्ति-गीतों की शृंखला — का भाग है। मूल मैथिली स्रोतों में यह पद "हे हर मन द करहुँ प्रतिपाल" शीर्षक से संकलित मिलता है, जबकि लोकगायन और संगीतबद्ध प्रस्तुतियों में इसे प्रायः "हे हर हमर करहु कृपाला" या "हे हर हम्मर करहुं प्रतिपाला" के रूप में गाया जाता है — शब्द-रूप में मामूली भिन्नता के साथ भाव एक ही है।

इस पद में भक्त अपने मन की दशा भगवान शिव के सम्मुख रखता है — वर्षों संसार की आशा में बीत गए, अब जीवन की संध्या में वह अन्य किसी की नहीं, केवल हर (शिव) की शरण चाहता है।

शब्दार्थ एवं भावार्थ

हर भगवान शिव — जो समस्त दुःख-हरण करने वाले हैं
प्रतिपाल / कृपाला पालन करने वाला, कृपा करने वाला
माया जाल संसार-मोह का बंधन
अनके आस दूसरों (सांसारिक विषयों) की आशा
बयस आयु, जीवनकाल
धयल शरण शरण ग्रहण की

भावार्थ

भक्त कहता है — हे हर, अब मेरा पालन करो; मैं जीवन भर माया के जाल में बँधा रहा। सदा दूसरों की आशा में समय बिताया, पर अब समझ आया कि अंतिम शरण तुम्हारे अतिरिक्त और किसी की नहीं। आयु बीत चुकी है, अब केवल तुम्हारी ही शरण चाहता हूँ।

यह पद वैराग्य और शरणागति (सम्पूर्ण समर्पण) के भाव को अत्यंत सरल, मार्मिक शब्दों में व्यक्त करता है — जो विद्यापति की भक्ति-रचनाओं की विशेषता है।

महाकवि विद्यापति — संक्षिप्त परिचय

विद्यापति ठाकुर (लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी) मिथिला के महाकवि थे, जिन्होंने मैथिली, संस्कृत एवं अवहट्ट में रचनाएँ कीं। वे शिव और शक्ति के परम भक्त थे, और उनकी शिव-भक्ति रचनाओं को सामूहिक रूप से "महेशवाणी" कहा जाता है। इसके साथ ही उनकी कृष्ण-राधा विषयक श्रृंगार रचनाएँ भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं। मिथिला में उन्हें आदर से "कविकोकिल" कहा जाता है, और उनके पद आज भी घर-घर, मंदिरों तथा लोक-आयोजनों में गाए जाते हैं।

लोकप्रिय प्रस्तुति

इस पद की एक लोकप्रिय संगीतबद्ध प्रस्तुति गायक उदित नारायण द्वारा गाई गई है, जिसमें भाव समान रहते हुए शब्द-रूप में क्षेत्रीय (भोजपुरी-मैथिली मिश्रित) भिन्नता मिलती है — जैसे "सब बिधि बाझलहूं माया जाला", "पारबती बस दारिद्र फेरू" आदि पंक्तियाँ इसी मूल भाव का विस्तार हैं। यह दर्शाता है कि विद्यापति के पद मौखिक परंपरा में सदियों से जीवंत रहते हुए किस तरह क्षेत्र और गायक-शैली के अनुसार थोड़ा रूप बदलते रहे हैं, मूल भक्ति-भाव को बनाए रखते हुए।

महत्व — यह भजन कब और क्यों गाया जाता है

इस पद की सरलता और गहराई ही इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखे हुए है — यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि मानव-मन की उस शाश्वत पुकार का प्रतिनिधित्व करता है जो संसार से थककर परम आश्रय ढूँढती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'हे हर हमर करहु कृपाला' गीत किसने लिखा है?

यह पद महाकवि विद्यापति ठाकुर द्वारा रचित शिव-भक्ति गीत है, जो 'महेशवाणी' परंपरा का प्रसिद्ध पद है।

इस पद में 'माया जाल' का क्या अर्थ है?

सांसारिक मोह-बंधन — जिस जाल में जीव उलझा रहता है, और जिससे मुक्ति के लिए भक्त शिव से कृपा माँगता है।

क्या यह गीत मूल रूप से मैथिली में है?

हाँ, मूल पद मैथिली में है; लोकप्रिय संगीत-प्रस्तुतियों में शब्द-रूप में क्षेत्रीय भिन्नता मिलती है।

यह भजन कब गाया जाता है?

सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि, शिव मंदिरों की संध्या आरती और भक्ति-संगीत सभाओं में।

'हे हर हमर करहु कृपाला' और 'हे हर मन द करहुँ प्रतिपाल' में क्या अंतर है?

दोनों एक ही मूल पद हैं — मूल मैथिली स्रोतों में दूसरा शीर्षक मिलता है, जबकि लोक-प्रचलन में पहला रूप अधिक गाया जाता है।