“हे हर हमर करहु कृपाला” में भक्त अपने जीवन की थकान, माया के बंधन और अंततः भगवान शिव की शरण में लौटने की पुकार व्यक्त करता है। नीचे आपको पूरा मैथिली पद, उसका सरल भावार्थ, शब्दों का अर्थ और इस भजन की लोकप्रिय प्रस्तुति एक ही जगह मिलेगी।
पद परिचय
"हे हर हमर करहु कृपाला" महाकवि विद्यापति ठाकुर द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय शिव-भक्ति पद है, जो मिथिला की महेशवाणी परंपरा — अर्थात शिव को समर्पित भक्ति-गीतों की शृंखला — का भाग है। मूल मैथिली स्रोतों में यह पद "हे हर मन द करहुँ प्रतिपाल" शीर्षक से संकलित मिलता है, जबकि लोकगायन और संगीतबद्ध प्रस्तुतियों में इसे प्रायः "हे हर हमर करहु कृपाला" या "हे हर हम्मर करहुं प्रतिपाला" के रूप में गाया जाता है — शब्द-रूप में मामूली भिन्नता के साथ भाव एक ही है।
इस पद में भक्त अपने मन की दशा भगवान शिव के सम्मुख रखता है — वर्षों संसार की आशा में बीत गए, अब जीवन की संध्या में वह अन्य किसी की नहीं, केवल हर (शिव) की शरण चाहता है।
शब्दार्थ एवं भावार्थ
भावार्थ
भक्त कहता है — हे हर, अब मेरा पालन करो; मैं जीवन भर माया के जाल में बँधा रहा। सदा दूसरों की आशा में समय बिताया, पर अब समझ आया कि अंतिम शरण तुम्हारे अतिरिक्त और किसी की नहीं। आयु बीत चुकी है, अब केवल तुम्हारी ही शरण चाहता हूँ।
यह पद वैराग्य और शरणागति (सम्पूर्ण समर्पण) के भाव को अत्यंत सरल, मार्मिक शब्दों में व्यक्त करता है — जो विद्यापति की भक्ति-रचनाओं की विशेषता है।
महाकवि विद्यापति — संक्षिप्त परिचय
विद्यापति ठाकुर (लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी) मिथिला के महाकवि थे, जिन्होंने मैथिली, संस्कृत एवं अवहट्ट में रचनाएँ कीं। वे शिव और शक्ति के परम भक्त थे, और उनकी शिव-भक्ति रचनाओं को सामूहिक रूप से "महेशवाणी" कहा जाता है। इसके साथ ही उनकी कृष्ण-राधा विषयक श्रृंगार रचनाएँ भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं। मिथिला में उन्हें आदर से "कविकोकिल" कहा जाता है, और उनके पद आज भी घर-घर, मंदिरों तथा लोक-आयोजनों में गाए जाते हैं।
लोकप्रिय प्रस्तुति
इस पद की एक लोकप्रिय संगीतबद्ध प्रस्तुति गायक उदित नारायण द्वारा गाई गई है, जिसमें भाव समान रहते हुए शब्द-रूप में क्षेत्रीय (भोजपुरी-मैथिली मिश्रित) भिन्नता मिलती है — जैसे "सब बिधि बाझलहूं माया जाला", "पारबती बस दारिद्र फेरू" आदि पंक्तियाँ इसी मूल भाव का विस्तार हैं। यह दर्शाता है कि विद्यापति के पद मौखिक परंपरा में सदियों से जीवंत रहते हुए किस तरह क्षेत्र और गायक-शैली के अनुसार थोड़ा रूप बदलते रहे हैं, मूल भक्ति-भाव को बनाए रखते हुए।
महत्व — यह भजन कब और क्यों गाया जाता है
- सावन के सोमवार — शिव-आराधना के इस पावन मास में यह पद विशेष रूप से गाया जाता है।
- महाशिवरात्रि — रात्रि-जागरण और भजन-संध्या में इसका गायन प्रचलित है।
- शिव मंदिरों की संध्या आरती — कई मैथिल शिव-मंदिरों में नियमित रूप से गाया जाने वाला पद।
- वैराग्य एवं आत्म-चिंतन के प्रसंग — जीवन की क्षणभंगुरता और शरणागति भाव के कारण यह भजन ध्यान व सत्संग में भी गाया जाता है।
इस पद की सरलता और गहराई ही इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखे हुए है — यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि मानव-मन की उस शाश्वत पुकार का प्रतिनिधित्व करता है जो संसार से थककर परम आश्रय ढूँढती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'हे हर हमर करहु कृपाला' गीत किसने लिखा है?
यह पद महाकवि विद्यापति ठाकुर द्वारा रचित शिव-भक्ति गीत है, जो 'महेशवाणी' परंपरा का प्रसिद्ध पद है।
इस पद में 'माया जाल' का क्या अर्थ है?
सांसारिक मोह-बंधन — जिस जाल में जीव उलझा रहता है, और जिससे मुक्ति के लिए भक्त शिव से कृपा माँगता है।
क्या यह गीत मूल रूप से मैथिली में है?
हाँ, मूल पद मैथिली में है; लोकप्रिय संगीत-प्रस्तुतियों में शब्द-रूप में क्षेत्रीय भिन्नता मिलती है।
यह भजन कब गाया जाता है?
सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि, शिव मंदिरों की संध्या आरती और भक्ति-संगीत सभाओं में।
'हे हर हमर करहु कृपाला' और 'हे हर मन द करहुँ प्रतिपाल' में क्या अंतर है?
दोनों एक ही मूल पद हैं — मूल मैथिली स्रोतों में दूसरा शीर्षक मिलता है, जबकि लोक-प्रचलन में पहला रूप अधिक गाया जाता है।