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✦ विद्यापति विरचितम् ✦

Hum Nai Shiv Sang Gauri Vihahab

हम नै शिव संग गौरी विहाहब
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विद्यापति का यह प्रसिद्ध मैथिली गीत शिव–गौरी विवाह की लोकभावना और बरियाती के अद्भुत चित्रण को सामने रखता है। गीत में गौरी के विवाह को लेकर मन की भावनाएँ और विद्यापति की काव्य-दृष्टि दिखाई देती है।

रचयिता : विद्यापति • मैथिली गीत • शिव–गौरी विवाह
हम नै शिव संग गौरी विहाहब, चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई
हम नै शिव संग गौरी विहाहब💫 चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई💫 बहुत प्रेत बरियाती अन्हार, मोर जिया गेल डराई गे माई💫

हम नै शिव संग गौरी विहाहब — पूरा मैथिली गीत

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✦ हम नै शिव संग गौरी विहाहब — विद्यापति का मैथिली गीत ✦
॥ पद १ ॥
मुखड़ा
हम नै शिव संग गौरी विहाहब,
चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई॥
Ham Nai Shiv Sang Gauri Vihahab, Chahe Gauri Rehthi Kumari Ge Maai
गीत का मुखड़ा गौरी के विवाह और उनके कुमारी रहने के बीच की भावभूमि को सामने रखता है।
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॥ पद २ ॥
शिव की बरियाती
भूत प्रेत बरियाती आनलैइन,
मोर जिया गेल डराई गे माई॥
Bahut Pret Bariyati Anhaar, Mor Jiya Gel Darai Ge Maai
शिव की बरियाती का रूप देखकर मन भयभीत हो जाता है—प्रेतों से भरी अँधेरी-सी बरियाती का लोकचित्र इस पद में उभरता है।
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॥ पद ३ ॥
मुखड़ा पुनरावृत्ति
हम नै शिव संग गौरी विहाहब,
चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई॥
Ham Nai Shiv Sang Gauri Vihahab, Chahe Gauri Rehthi Kumari Ge Maai
मुखड़े की पुनरावृत्ति गीत के केंद्रीय भाव को फिर से स्थापित करती है।
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॥ पद ४ ॥
शिव का विचित्र रूप
गाल छुटकल, केसो पागल,
पैरो में चाटकल बीमारी के माई॥
चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई॥
चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई॥
Gali Chhutal, Keso Pagal, Pairo Mein Chatal Bimari Ke Maai. Chahe Gauri Rehthi Kumari Ge Maai.
इस पद में शिव की बरियाती और उनके अनगढ़, लोकचित्रात्मक रूप का वर्णन मिलता है, जिसके कारण गौरी के विवाह को लेकर भावनात्मक संकोच दिखाई देता है।
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॥ पद ५ ॥
गौरी को ले जाने की बात
गौरी ले भागब, गौरी ले जायब।
गौरी ले भागब, गौरी ले जायब॥
गौरी ले नैहर परायब के माई॥
Gauri Le Bhaagab, Gauri Le Jayab. Gauri Le Naihar Paraib Ke Maai.
यहाँ गौरी को अपने साथ ले जाने और उनके नैहर से विदा कराने की भावपूर्ण कल्पना आती है।
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॥ पद ६ ॥
विवाह का संकल्प
हम नै शिव संग गौरी विहाहब के माई॥
Ham Nai Shiv Sang Gauri Vihahab Ke Maai
गीत फिर अपने मुख्य भाव पर लौटता है—शिव और गौरी के विवाह का संकल्प।
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॥ पद ७ ॥
विद्यापति की वाणी
भनै विद्यापति, सुनु हे मनाई,
भनै विद्यापति, सुनु हे मनाई।
एहो छथि त्रिभुवन नाथ गे माई,
एहो छथि त्रिभुवन नाथ गे माई॥
Bhanai Vidyapati, Sunu He Manai. Eho Chhaith Tribhuvan Nath Ge Maai.
अंत में कवि विद्यापति अपनी वाणी के माध्यम से शिव को त्रिभुवन नाथ के रूप में स्मरण करते हैं।
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॥ पद ८ ॥
समापन मुखड़ा
हम नै शिव संग गौरी विहाहब,
चाहे गौरी रहथी कुमारी गे माई॥
Ham Nai Shiv Sang Gauri Vihahab, Chahe Gauri Rehthi Kumari Ge Maai
गीत का समापन उसी प्रमुख पंक्ति से होता है जो पूरे पद का भावात्मक आधार है।
✦ गीत का आशय ✦
विद्यापति से संबद्ध यह मैथिली गीत शिव–गौरी विवाह, शिव की अनोखी बरियाती और लोकभाषा में व्यक्त भावनाओं का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता है।
Maithili Geet • Vidyapati • Shiv–Gauri Vivaah • Maithili Lokbhava
इस गीत में शिव की बरियाती, गौरी के विवाह और लोकजीवन से जुड़े भावों का चित्रात्मक वर्णन मिलता है।

💫 हम नै शिव संग गौरी विहाहब — विद्यापति का गीत

यह पृष्ठ विद्यापति गीत परंपरा के इस मैथिली पद का पाठ प्रस्तुत करता है। इसमें शिव–गौरी विवाह, बरियाती और कवि विद्यापति की वाणी से जुड़े पद शामिल हैं।

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