हे करुणा-निधि भोलानाथ, सुनु मोर पुकार,
भोर भेल अहाँ बिना, कोना करू पार।
यह एक मौलिक मैथिली शिव-भक्ति रचना है, जिसमें भक्त की सीधी पुकार के माध्यम से भोलानाथ के करुणामय स्वरूप को स्मरण किया गया है। गीत की भाषा जानबूझकर सरल और गेय रखी गई है, ताकि इसे प्रातःकालीन भक्ति, निजी पाठ या सामूहिक गायन में सहजता से अपनाया जा सके।
पदों में कैलाश पर तपस्वी शिव, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, भक्त के हृदय में प्रकाश, विषपान करने वाले नीलकंठ और डमरू-नाद से जुड़े रौद्र-रूप जैसे अलग-अलग धार्मिक-कल्पनात्मक बिंब आते हैं। इस तरह गीत केवल स्तुति नहीं करता, बल्कि शांत, करुण और उग्र — शिव के अनेक भावों को एक ही रचना में जोड़ता है।
“विद्यापति शैली से प्रेरित” का प्रयोग यहाँ शैलीगत संकेत के रूप में है — मैथिली भाषा, शिव-भक्ति, सहज संबोधन और पद-गायन की परंपरा की ओर संकेत करने के लिए। इससे इस रचना को विद्यापति की ऐतिहासिक पदावली का हिस्सा नहीं समझना चाहिए। यह भेद इसलिए स्पष्ट रखा गया है ताकि पाठक को रचना के स्रोत और स्वरूप के बारे में सही जानकारी मिले।
नहीं। यह पृष्ठ इसे ShivMarg की मौलिक रचना के रूप में प्रस्तुत करता है, जो विद्यापति-परंपरा और मैथिली शिव-भक्ति काव्य से प्रेरित है।
गीत मैथिली में रचा गया है और इसकी शब्दावली शिव-भक्ति तथा मिथिला की पद-गायन परंपरा से जुड़ी है।
कैलाश, जटाओं की गंगा, मस्तक का चंद्रमा, विषपान, डमरू और तांडव जैसे बिंब इस रचना में प्रमुख हैं।
रचना की भाषा और दोहराया गया मुखड़ा इसे भक्ति-गायन के लिए उपयुक्त बनाते हैं। पृष्ठ पर दिया गया पाठ ही इस रचना का आधार है।