परती गीत · शिव स्तुति

हे करुणा-निधि भोलानाथ

मौलिक रचना — ShivMarg · विद्यापति-परंपरा से प्रेरित
रचना-सूचना: यह पृष्ठ ShivMarg की मौलिक रचना के रूप में प्रकाशित है। गीत में मैथिली भक्ति, परती/नचारी परंपरा और विद्यापति-प्रेरित भाव-भाषा का रचनात्मक प्रभाव है; इसे महाकवि विद्यापति का मूल पद नहीं बताया जा रहा है।

हे करुणा-निधि भोलानाथ, सुनु मोर पुकार,
भोर भेल अहाँ बिना, कोना करू पार।

तपसी रूप धारी अहाँ, बैसल कैलाश,
गंगा जट में सोहय, चंद्र शिर पास।
भक्तक हृदय मध्य बसथि, करैत उजियार, हे करुणा-निधि भोलानाथ, सुनु मोर पुकार।
नित्य प्रात उठि गाबय, नाम अहीं क'र,
मन क'र मलिनता हरू, दुख देहू दूर।
विष पीबि जग बचायल, अहीं दातार, हे करुणा-निधि भोलानाथ, सुनु मोर पुकार।
डमरू-नाद गुंजय जखन, कांपय संसार,
तांडव में समायल छै, सृष्टिक आधार।
भक्ति देहू, शक्ति देहू, हरू अंधकार, हे करुणा-निधि भोलानाथ, सुनु मोर पुकार।
गीत के बारे में

“हे करुणा-निधि भोलानाथ” किस प्रकार का गीत है?

यह एक मौलिक मैथिली शिव-भक्ति रचना है, जिसमें भक्त की सीधी पुकार के माध्यम से भोलानाथ के करुणामय स्वरूप को स्मरण किया गया है। गीत की भाषा जानबूझकर सरल और गेय रखी गई है, ताकि इसे प्रातःकालीन भक्ति, निजी पाठ या सामूहिक गायन में सहजता से अपनाया जा सके।

गीत में शिव के कौन-कौन से भाव आते हैं?

पदों में कैलाश पर तपस्वी शिव, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, भक्त के हृदय में प्रकाश, विषपान करने वाले नीलकंठ और डमरू-नाद से जुड़े रौद्र-रूप जैसे अलग-अलग धार्मिक-कल्पनात्मक बिंब आते हैं। इस तरह गीत केवल स्तुति नहीं करता, बल्कि शांत, करुण और उग्र — शिव के अनेक भावों को एक ही रचना में जोड़ता है।

विद्यापति-परंपरा से प्रेरणा का अर्थ

“विद्यापति शैली से प्रेरित” का प्रयोग यहाँ शैलीगत संकेत के रूप में है — मैथिली भाषा, शिव-भक्ति, सहज संबोधन और पद-गायन की परंपरा की ओर संकेत करने के लिए। इससे इस रचना को विद्यापति की ऐतिहासिक पदावली का हिस्सा नहीं समझना चाहिए। यह भेद इसलिए स्पष्ट रखा गया है ताकि पाठक को रचना के स्रोत और स्वरूप के बारे में सही जानकारी मिले।

॥ शुभम् ॥
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या यह विद्यापति का मूल गीत है?

नहीं। यह पृष्ठ इसे ShivMarg की मौलिक रचना के रूप में प्रस्तुत करता है, जो विद्यापति-परंपरा और मैथिली शिव-भक्ति काव्य से प्रेरित है।

गीत किस भाषा में है?

गीत मैथिली में रचा गया है और इसकी शब्दावली शिव-भक्ति तथा मिथिला की पद-गायन परंपरा से जुड़ी है।

गीत में किन शिव-स्वरूपों का उल्लेख है?

कैलाश, जटाओं की गंगा, मस्तक का चंद्रमा, विषपान, डमरू और तांडव जैसे बिंब इस रचना में प्रमुख हैं।

क्या इसे भजन के रूप में गाया जा सकता है?

रचना की भाषा और दोहराया गया मुखड़ा इसे भक्ति-गायन के लिए उपयुक्त बनाते हैं। पृष्ठ पर दिया गया पाठ ही इस रचना का आधार है।