करवा चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देना पूरे व्रत का समापन-क्षण होता है। चंद्रोदय होते ही छलनी की ओट से चंद्र-दर्शन किए जाते हैं, जल से अर्घ्य दिया जाता है, और फिर पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोला जाता है। 29 अक्टूबर 2026 को पटना में यह शाम लगभग 7:52 बजे और नई दिल्ली में रात लगभग 8:17 बजे होगा। नीचे अर्घ्य की पूरी विधि क्रम से, सरल भाषा में दी गई है।
अर्घ्य का महत्व
हिंदू परंपरा में चंद्रमा को मन का कारक और शीतलता का प्रतीक माना गया है। भगवान शिव के मस्तक पर चंद्र का विराजमान होना भी इसी भाव को दर्शाता है। करवा चौथ का व्रत पूरा दिन तप, संयम और प्रतीक्षा का होता है, और चंद्र-दर्शन के साथ अर्घ्य उस प्रतीक्षा का सम्मानपूर्वक समापन है।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी पर चंद्र-दर्शन की परंपरा इसी तिथि की संकष्टी चतुर्थी से भी जुड़ती है, जिसमें गणेश जी के पूजन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। 2026 में दोनों एक ही दिन हैं।
अर्घ्य की तैयारी
- चंद्रोदय से 15-20 मिनट पहले ही छत, आँगन या बालकनी में जाने की तैयारी कर लें।
- एक साफ लोटे या करवे में स्वच्छ जल भरें। परंपरा के अनुसार उसमें थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत या फूल की पंखुड़ी भी डाली जाती है।
- थाली में दीपक, छलनी, रोली, अक्षत, मिठाई और जल का गिलास रखें।
- पति के लिए बैठने की जगह और पानी का एक अलग गिलास तैयार रखें।
- करवा चौथ की शाम की पूजा पहले पूरी हो चुकी हो। पूरी पूजा विधि मुख्य गाइड में है।
अर्घ्य देने की विधि: क्रम से
- चंद्र-दर्शन: चंद्रमा दिखते ही थाली में दीपक जलाकर छलनी की ओट से पहले चंद्रमा को देखें।
- प्रणाम और मंत्र: हाथ जोड़कर चंद्रदेव को प्रणाम करें और मन में उनसे अपने परिवार के सुख-सौभाग्य की प्रार्थना करें।
- अर्घ्य: लोटे से धीरे-धीरे जल की धारा चंद्रमा की ओर गिराएँ। यह जल भूमि पर किसी साफ पात्र में गिरे तो बेहतर है, ताकि पैरों में न आए।
- पति का मुख देखना: उसी छलनी से पति का मुख देखें। यह रस्म प्रेम और दांपत्य के सम्मान का प्रतीक है।
- आशीर्वाद: पति और घर के बड़ों के चरण स्पर्श करें और आशीर्वाद लें।
- पारण: पति अपने हाथ से जल पिलाते हैं और मिठाई या पहला ग्रास खिलाते हैं। इसके बाद सामान्य भोजन किया जा सकता है।
अर्घ्य के समय बोले जाने वाले मंत्र
अर्घ्य के समय आमतौर पर चंद्रदेव के सरल नाम-मंत्र बोले जाते हैं:
- ॐ सोमाय नमः
- ॐ चन्द्राय नमः
कई परिवारों में चतुर्थी के अवसर पर चंद्र को अर्घ्य देने के लिए अलग-अलग श्लोक भी बोले जाते हैं, और ये श्लोक क्षेत्र तथा गुरु-परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं। यदि आपके परिवार में कोई विशेष श्लोक चला आ रहा है, तो उसी का पालन करें। निश्चित पाठ के लिए अपने कुलपुरोहित से पूछ लें। मन की शुद्धता और श्रद्धा, शब्दों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सावधानियाँ और छोटी बातें
- दिनभर के निर्जल व्रत के बाद एक साथ बहुत ठंडा जल या भारी भोजन न लें। पहले थोड़ा जल और मीठा लेना शरीर के लिए ठीक रहता है।
- छत पर अँधेरे में सीढ़ियों और छलनी-दीपक की थाली का ध्यान रखें। दीपक खुली हवा में बुझ सकता है, इसलिए ओट रखें।
- बादल हों तो स्थानीय पंचांग के अनुसार चंद्रोदय का समय देखें और अपनी पारिवारिक परंपरा पूछें। इसका विवरण चंद्रोदय समय वाले लेख में भी है।
- स्वास्थ्य ठीक न हो तो व्रत खोलने में देर न करें और चिकित्सक की सलाह मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अर्घ्य किस दिशा में देना चाहिए?
जिस दिशा में चंद्रमा दिखाई दे, उसी की ओर मुख करके। चंद्रोदय के समय वह सामान्यतः पूर्व-दक्षिण-पूर्व के क्षितिज की ओर होता है।
क्या अर्घ्य देने के लिए पति का साथ होना ज़रूरी है?
पारंपरिक रूप से पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोला जाता है। यदि पति दूर हों तो कई परिवारों में वीडियो कॉल या घर के बड़ों के हाथ से व्रत खोलने की परंपरा अपनाई जाती है।
छलनी से क्यों देखा जाता है?
इसे प्रेम और सम्मान से देखने का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे कई लोक मान्यताएँ हैं और क्षेत्र के अनुसार अर्थ भी अलग-अलग बताए जाते हैं।
निष्कर्ष
अर्घ्य की विधि सरल है: चंद्र-दर्शन, जल अर्पण, पति का मुख देखना, आशीर्वाद और पारण। समय का ध्यान रखें, पहले थोड़ा जल लें और श्रद्धा से यह क्षण पूरा करें।
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