श्री कीलक स्तोत्रम्
कीलक स्तोत्रम् देवी चण्डिका की उपासना में प्रसिद्ध स्तोत्र है। दुर्गा सप्तशती की पारंपरिक पाठ-परंपरा में इसका पाठ किया जाता है। इसमें देवी की स्तुति, साधना की महिमा और देवी-कृपा की प्रार्थना का भाव मिलता है।
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विनियोग
॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
श्रेयः प्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्द्धधारिणे ॥२
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥३
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥४
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥५
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥६
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥७
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥८
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥९
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११
तत्सर्वं त्वत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥ ॐ ॥१४
कीलक स्तोत्र का पारंपरिक भाव
“कीलक” शब्द का संबंध परंपरागत व्याख्या में एक प्रकार के बन्धन या अवरोध से जोड़ा जाता है। स्तोत्र में महादेव द्वारा कीलकित किए गए चण्डिका स्तोत्र का उल्लेख आता है और उसके निष्कीलन तथा श्रद्धापूर्वक जप की महिमा का वर्णन किया जाता है।
इसका केंद्रीय भाव देवी चण्डिका की कृपा प्राप्त करना, साधना में श्रद्धा रखना और देवी की शरण ग्रहण करना है। फलश्रुति में सौभाग्य, आरोग्य, सम्पदा, विजय और मोक्ष आदि की पारंपरिक स्तुति की गई है।
कीलक स्तोत्र का पाठ
- पाठ से पहले स्थान और शरीर की स्वच्छता का ध्यान रखें।
- देवी चण्डिका का ध्यान करके श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
- दुर्गा सप्तशती के पाठ में कीलक स्तोत्र के क्रम के लिए अपनी परंपरा की विधि अपनाएँ।
- विशेष मंत्र-साधना या अनुष्ठान में योग्य गुरु से विधि प्राप्त करना उचित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कीलक स्तोत्र क्या है?
कीलक स्तोत्र देवी चण्डिका की उपासना में पढ़ा जाने वाला पारंपरिक स्तोत्र है और दुर्गा सप्तशती पाठ-परंपरा में इसका विशेष स्थान है।
कीलक स्तोत्र किसके साथ पढ़ा जाता है?
पारंपरिक रूप से इसे दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य के पाठ के अंग के रूप में पढ़ा जाता है।
क्या नवरात्रि में कीलक स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
हाँ, नवरात्रि में देवी उपासना के अवसर पर इसका पाठ किया जा सकता है। अपनी पारंपरिक पूजा-विधि का पालन करना उचित है।
कीलक स्तोत्र कितनी बार पढ़ना चाहिए?
पाठ की संख्या अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकती है। सामान्य पाठ के लिए श्रद्धा और एकाग्रता महत्वपूर्ण मानी जाती है। विशेष अनुष्ठान में गुरु की विधि अपनाएँ।