श्री चण्डिका की आराधना

अथ कीलक स्तोत्रम्

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का पारंपरिक अंग
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श्री कीलक स्तोत्रम्

कीलक स्तोत्रम् देवी चण्डिका की उपासना में प्रसिद्ध स्तोत्र है। दुर्गा सप्तशती की पारंपरिक पाठ-परंपरा में इसका पाठ किया जाता है। इसमें देवी की स्तुति, साधना की महिमा और देवी-कृपा की प्रार्थना का भाव मिलता है।

पाठ संबंधी सूचना: नीचे दिया गया पाठ आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए पाठ के आधार पर वेब-पेज के लिए व्यवस्थित किया गया है। विशेष अनुष्ठान या मंत्र-साधना में अपनी गुरु-परंपरा की विधि को प्राथमिकता दें।

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विनियोग

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

॥ मार्कण्डेय उवाच ॥
सिद्धयन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि।
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयः प्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्द्धधारिणे ॥
सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम्।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्धयति।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥
समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ॥
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥
यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः ॥
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०
ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११
सौभाग्यादि च यत्किंचिद् दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं त्वत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२
शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३
ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥ ॐ ॥१४

कीलक स्तोत्र का पारंपरिक भाव

“कीलक” शब्द का संबंध परंपरागत व्याख्या में एक प्रकार के बन्धन या अवरोध से जोड़ा जाता है। स्तोत्र में महादेव द्वारा कीलकित किए गए चण्डिका स्तोत्र का उल्लेख आता है और उसके निष्कीलन तथा श्रद्धापूर्वक जप की महिमा का वर्णन किया जाता है।

इसका केंद्रीय भाव देवी चण्डिका की कृपा प्राप्त करना, साधना में श्रद्धा रखना और देवी की शरण ग्रहण करना है। फलश्रुति में सौभाग्य, आरोग्य, सम्पदा, विजय और मोक्ष आदि की पारंपरिक स्तुति की गई है।

कीलक स्तोत्र का पाठ

ध्यान दें: स्तोत्र की फलश्रुति को धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा के संदर्भ में समझें। इसे चिकित्सकीय या अन्य पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कीलक स्तोत्र क्या है?

कीलक स्तोत्र देवी चण्डिका की उपासना में पढ़ा जाने वाला पारंपरिक स्तोत्र है और दुर्गा सप्तशती पाठ-परंपरा में इसका विशेष स्थान है।

कीलक स्तोत्र किसके साथ पढ़ा जाता है?

पारंपरिक रूप से इसे दुर्गा सप्तशती या देवी माहात्म्य के पाठ के अंग के रूप में पढ़ा जाता है।

क्या नवरात्रि में कीलक स्तोत्र पढ़ सकते हैं?

हाँ, नवरात्रि में देवी उपासना के अवसर पर इसका पाठ किया जा सकता है। अपनी पारंपरिक पूजा-विधि का पालन करना उचित है।

कीलक स्तोत्र कितनी बार पढ़ना चाहिए?

पाठ की संख्या अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकती है। सामान्य पाठ के लिए श्रद्धा और एकाग्रता महत्वपूर्ण मानी जाती है। विशेष अनुष्ठान में गुरु की विधि अपनाएँ।