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✦ संतोषी माता आरती — सम्पूर्ण पाठ ✦
✦ आरती — जय जय संतोषी माता जय जय ✦
जय जय संतोषी माता जय जय
मैया, सन्तोषी माता
अपने सेवक जन की
सुख सम्पति दाता
सुन्दर चीर सुनहरी
माँ धारण कीन्हो
(मैया, धारण कीन्हो)
हीरा पन्ना दमके
(हीरा पन्ना दमके)
तन श्रृंगार लीन्हो
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद २ ॥
माँ की मनोहर छवि
गेरू लाल छटा छबि, बदन कमल सोहे
(मैया, बदन कमल सोहे)
मंद हँसत करुणामयी
(मंद हँसत करुणामयी)
त्रिभुवन मन मोहे
जय जय संतोषी माता जय जय
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स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर दुरे प्यारे
(मैया, चंवर दुरे प्यारे)
धूप, दीप, मधु, मेवा
(धूप, दीप, मधु, मेवा)
भोग धरे न्यारे
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद ४ ॥
गुड़-चना एवं संतोष
गुड़ और चना परम प्रिय, तामें संतोष किए
(मैया, तामें संतोष किए)
संतोषी कहलाई
(संतोषी कहलाई)
भक्तन विभव दिए
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद ५ ॥
शुक्रवार की महिमा
शुक्रवार प्रिय मानती, आज दिवस सोही
(मैया, आज दिवस सोही)
भक्त मंडली छाई
(भक्त मंडली छाई)
कथा सुनत मोही
जय जय संतोषी माता जय जय
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मंदिर जग-मग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई
(मैया, मंगल ध्वनि छाई)
विनय करें हम सेवक
(विनय करें हम सेवक)
चरनन सिर नाई
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद ७ ॥
भक्ति एवं मनोकामना
भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै
(मैया, अंगीकृत कीजै)
जो मन बसे हमारे
(जो मन बसे हमारे)
इच्छित फल दीजै
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद ८ ॥
संकट मुक्ति एवं सुख-सौभाग्य
दुखी, दरिद्री, रोगी संकट मुक्त किए
(मैया, संकट मुक्त किए)
बहु धन-धान्य भरे घर
(बहु धन-धान्य भरे घर)
सुख सौभाग्य दिए
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद ९ ॥
ध्यान, पूजा एवं आनंद
ध्यान धरे जन तेरा, मन वांछित फल पायो
(मन वांछित फल पायो)
पूजा, कथा, श्रवण कर
(पूजा, कथा, श्रवण कर)
घर आनंद आयो
जय जय संतोषी माता जय जय
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॥ पद १० ॥
शरण एवं प्रार्थना
शरण गहे की लज्जा, रखियो जगदम्बे
(मैया, रखियो जगदम्बे)
संकट तू ही निवारे
(संकट तू ही निवारे)
दयामयी अम्बे
जय जय संतोषी माता जय जय
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सन्तोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे
(मैया, जो कोई जन गावे)
रिद्धि-सिद्धि सुख सम्पति
(रिद्धि-सिद्धि सुख सम्पति)
जी-भर के पावे
जय जय संतोषी माता जय जय
✦ समापन ✦
जय जय संतोषी माता जय जय
मैया, सन्तोषी माता
अपने सेवक जन की
सुख सम्पति दाता
✦ संतोषी माता व्रत कथा ✦
एक बार एक साहूकार की सात बेटियाँ थीं। छह बड़ी बहनें माँ संतोषी का व्रत करती थीं परन्तु सबसे छोटी बेटी कभी व्रत नहीं करती थी। शुक्रवार को बड़ी बहनें माँ संतोषी को गुड़-चना का भोग लगाती थीं।
एक बार छोटी बेटी अपनी सहेलियों के साथ घूमने गई। सहेलियाँ शुक्रवार का व्रत कर रही थीं। सहेलियों ने बताया कि यह माँ संतोषी का व्रत है जो सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
उसी दिन से छोटी बेटी ने भी माँ संतोषी का व्रत शुरू किया। उसने सोलह शुक्रवार का व्रत किया। माँ की कृपा से उसके घर में सुख-समृद्धि आई, विवाह हुआ और सन्तान प्राप्त हुई।
व्रत की पूर्णाहुति पर उसने कथा सुनाई और गुड़-चने का प्रसाद बाँटा। माँ संतोषी प्रसन्न हुईं और उन पर सदा के लिए कृपा बरसाई। तभी से यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है।
✦ व्रत के नियम ✦
🌿 क्या करें — शुक्रवार को उपवास रखें। माँ को गुड़-चना और फल का भोग लगाएँ। आरती और कथा सुनें या पढ़ें। सोलह शुक्रवार व्रत करने का संकल्प लें।
🚫 क्या न करें — व्रत के दिन खट्टी चीजें न खाएँ (नींबू, इमली, दही आदि)। घर में खट्टा पदार्थ न आने दें। किसी को कटु वचन न कहें।
✦ फलश्रुति — Phala Shruti ✦
सोलह शुक्रवार जो व्रत करे।
माँ संतोषी सब दुख हरे॥
घर में सुख-समृद्धि आए नित।
मनोकामना पूर्ण हो सहित॥
जो सोलह शुक्रवार का व्रत करता है, माँ संतोषी उसके सभी दुख हरती हैं। घर में सुख-समृद्धि आती है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
💚 संतोषी माता — परिचय एवं महत्व
संतोषी माता भगवान गणेश की पुत्री मानी जाती हैं। वे संतोष और सुख की देवी हैं। उनका मुख्य पर्व शुक्रवार का व्रत है, जिसे सोलह शुक्रवार तक करने का विधान है।
उनका प्रसाद गुड़-चना है — इसमें खट्टी चीजें वर्जित हैं। उनकी भक्ति से संतान, सुख, समृद्धि और पारिवारिक शान्ति प्राप्त होती है।
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शुक्रवार व्रतसोलह शुक्रवार तक उपवास रखने और कथा सुनने से माँ प्रसन्न होती हैं।
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गुड़-चना प्रसादमाँ को गुड़ और भुने चने का भोग सबसे प्रिय है — खट्टी चीजें वर्जित हैं।
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कथा श्रवणव्रत के दिन कथा अवश्य सुनें और प्रसाद सभी में बाँटें।
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उद्यापनसोलहवें व्रत पर उद्यापन करें — ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराएँ।