* सटीक समय स्थान (सूर्योदय) के अनुसार भिन्न हो सकता है — अपने स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है — जिसे हरिशयनी, पद्मनाभ, आषाढ़ी अथवा तोली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन से भगवान विष्णु के योगनिद्रा-काल और चातुर्मास का शुभारम्भ माना जाता है।
महाभारत युद्ध के पश्चात् हस्तिनापुर में धर्म पुनः स्थापित हो चुका था। एक दिन युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — आषाढ़ शुक्ल एकादशी का नाम, विधि और महत्व क्या है?
"राजन्! तुमने अत्यंत कल्याणकारी प्रश्न किया है। यह एकादशी देवशयनी, हरिशयनी अथवा पद्मनाभ एकादशी कहलाती है। इसका माहात्म्य सुनने मात्र से मनुष्य के अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं।" — श्रीकृष्ण
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में अनन्त शेष की शय्या पर योगनिद्रा धारण करते हैं। यह साधारण नींद नहीं — सृष्टि के संतुलन और आध्यात्मिक विश्राम का प्रतीक है। भगवान न अज्ञान में सोते हैं, न संसार का पालन छोड़ते हैं। क्षीरसागर की लहरों पर शेषनाग अपनी फणों से शय्या बनाते हैं, माता लक्ष्मी चरण-सेवा करती हैं, और देवगण प्रणाम करते हैं। इसी क्षण से चातुर्मास आरम्भ होता है।
इन्द्र, ब्रह्मा, शिव आदि देवताओं ने भगवान की स्तुति की — "आप बिना जगत का कोई कार्य सम्पन्न नहीं होता।" भगवान ने आश्वासन दिया — "मैं योगनिद्रा में रहूँगा, परन्तु सृष्टि का संचालन निरन्तर होता रहेगा। जो भक्त इन चार महीनों में संयम, भक्ति, जप-तप और दान करेंगे, उन पर मेरी विशेष कृपा होगी।"
भगवान की आज्ञा से चार मास संयम, जप, दान और भगवत्-स्मरण के लिए समर्पित किए गए। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करते थे, ताकि छोटे जीवों की रक्षा हो और साधना में स्थिरता बनी रहे। देवशयनी से देवोत्थान एकादशी तक की यह अवधि ही चातुर्मास कहलाती है।
सूर्यवंशी राजा मान्धाता धर्मपूर्वक राज्य करते थे, फिर भी तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई और प्रजा अकाल से त्रस्त हो गई। उत्तर की खोज में राजा महर्षि अंगिरा के पास पहुँचे। महर्षि ने बताया कि धर्म में कहीं विघ्न हुआ है, इसलिए प्रकृति असंतुलित हुई है, और उपाय बताया — सम्पूर्ण राज्य सहित आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करें। राजा और प्रजा ने व्रत, पूजा और रात्रि-जागरण किया। भगवान प्रसन्न हुए, मूसलाधार वर्षा हुई, धरती पुनः हरी-भरी हो गई। इसी से इस व्रत का माहात्म्य पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ।
वामन अवतार में भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी, तीनों लोक नापने के बाद उन्हें सुतल लोक का अधिपति बना दिया। भक्त बलि की प्रार्थना पर भगवान ने वचन दिया कि वे सदा उनके समीप रहेंगे। इसी वैष्णव परंपरा में यह भी कहा जाता है कि भगवान एक स्वरूप से बलि के साथ रहते हैं और दूसरे स्वरूप से क्षीरसागर में योगनिद्रा धारण करते हैं।
श्रीकृष्ण ने अंत में कहा — "जो श्रद्धा, नियम और भक्ति से यह व्रत करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, मन शुद्ध होता है और उसे परम कल्याण की प्राप्ति होती है।" युधिष्ठिर ने प्रणाम कर स्वयं यह व्रत रखने का संकल्प लिया।
पूजा विधि| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारम्भ | 24 जुलाई 2026, प्रातःकाल |
| एकादशी तिथि समाप्त | 25 जुलाई 2026, पूर्वाह्न |
| व्रत की तिथि | 25 जुलाई 2026 (शनिवार) |
| पारण (व्रत खोलना) | 26 जुलाई 2026, सूर्योदय के पश्चात् |
| चातुर्मास समाप्ति | देवोत्थान एकादशी, कार्तिक शुक्ल पक्ष |
सटीक घंटे-मिनट स्थानीय सूर्योदय पर निर्भर करते हैं — पारण से पूर्व अपने शहर का पंचांग अवश्य जाँच लें।
प्रश्नदेवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026, शनिवार को मनाई जाएगी। पारण 26 जुलाई को सूर्योदय के बाद होगा।
नहीं। शास्त्रों में इसे योगनिद्रा कहा गया है — यह साधारण नींद नहीं बल्कि सृष्टि-संतुलन और दिव्य समाधि की प्रतीकात्मक अवस्था है। भगवान सतत जगत के पालनकर्ता बने रहते हैं।
चातुर्मास को भगवान विष्णु के योगनिद्रा-काल के रूप में देखा जाता है, इसलिए इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। ये देवोत्थान एकादशी के बाद पुनः आरम्भ होते हैं।
परंपरागत रूप से राजा मान्धाता की कथा व्रत-कथा के रूप में पढ़ी/सुनाई जाती है, जो व्रत के फल का माहात्म्य बताती है।
हाँ। महाराष्ट्र में इसे आषाढ़ी एकादशी कहा जाता है और पंढरपुर की पालखी यात्रा इसी दिन के साथ जुड़ी है। हरिशयनी, पद्मनाभ, तोली एकादशी — ये सभी इसी पर्व के अन्य नाम हैं।
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