संक्षिप्त परिचय
| पर्व का नाम | देव उठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) |
|---|---|
| अन्य नाम | देवोत्थान एकादशी, देवुत्थान एकादशी, हरिप्रबोधिनी एकादशी, कार्तिकी एकादशी, थुलो एकादशी (नेपाल) |
| अंग्रेज़ी नाम | Dev Uthani Ekadashi / Prabodhini Ekadashi |
| धर्म | हिन्दू धर्म, विशेषतः वैष्णव संप्रदाय |
| हिन्दू माह | कार्तिक मास |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | एकादशी |
| व्रत तिथि (स्मार्त) | 20 नवंबर 2026 (शुक्रवार) |
| व्रत तिथि (वैष्णव) | 21 नवंबर 2026 (शनिवार) |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 20 नवंबर 2026, प्रातः 07:16 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 21 नवंबर 2026, प्रातः 06:32 बजे |
| पारण समय (स्मार्त) | 21 नवंबर 2026, दोपहर 01:11 से 03:18 बजे तक |
| पारण समय (वैष्णव) | 22 नवंबर 2026, प्रातः 06:49 से 08:56 बजे तक |
| तुलसी विवाह | 21 नवंबर 2026, शनिवार (द्वादशी तिथि, संध्याकाल) |
| प्रमुख देवता | भगवान विष्णु एवं तुलसी माता (लक्ष्मी स्वरूपा) |
| पूजन का उद्देश्य | भगवान विष्णु का जागरण, चातुर्मास समापन, मांगलिक कार्यों का शुभारंभ |
| विशेष महत्व | इसी दिन से विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन आदि मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ होते हैं |
| 2026 में कुल एकादशी | 24 (अधिक मास के कारण, सामान्यतः 23) |
मूल कथा — चातुर्मास और विष्णु की योगनिद्रा
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। कथा के अनुसार, वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीनों लोक माँग लिए थे, परंतु बलि की अटूट भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्होंने बलि को पाताल लोक का राज्य लौटाया और स्वयं वर्ष के चार माह बलि के द्वार पर रक्षक बनकर रहने का वचन दिया। यही चार माह चातुर्मास कहलाते हैं, जिसमें भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी पाताल लोक में निवास करते हैं और सृष्टि का सांसारिक कार्यभार शिव जी संभालते हैं।
इन चार माहों में विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन, उपनयन जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, क्योंकि सृष्टि के पालनहार विष्णु स्वयं विश्राम में होते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु इसी योगनिद्रा से जागते हैं — इसलिए इसे प्रबोधिनी (जागरण की एकादशी) या देव उठनी एकादशी कहा जाता है। इसी दिन से चातुर्मास समाप्त होकर सभी मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होता है।
देव-जागरण की परंपरा — "उठो देव, बैठो देव"
संध्याकाल गाँव-गाँव और घर-घर में स्त्रियाँ आँगन में शंख व घंटी बजाकर, दीप जलाकर, विशेष जागरण-गीत गाते हुए भगवान विष्णु को पुकारती हैं — "उठो देव, बैठो देव, अंगुरिया चटकाओ देव, कार्तिक मास आया देव, गन्ना खाओ देव"। यह लोकगीत भगवान को इस तरह जगाने का भाव प्रकट करता है मानो घर का कोई सम्माननीय अतिथि दीर्घ निद्रा के बाद जाग रहा हो। इसी रात्रि आँगन में मुख्य द्वार से पूजा-स्थल तक चावल के आटे या हल्दी-चूने से विष्णु भगवान के पद-चिन्ह (पगल्या) अंकित किए जाते हैं, मानो भगवान स्वयं चलकर घर में पधार रहे हों।
तुलसी-शालिग्राम विवाह की कथा — वृंदा की भक्ति और वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार वृंदा नामक परम पतिव्रता स्त्री दैत्यराज जालंधर की पत्नी थी। उसके सतीत्व और भक्ति की शक्ति ही जालंधर को देवताओं के लिए अजेय बनाती थी। जब देवताओं और जालंधर के बीच युद्ध लंबा खिंचा, तब देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के पास जाने की युक्ति रची, जिससे उसका सतीत्व भंग हुआ और तभी युद्ध में जालंधर मारा गया।
सत्य जानकर वृंदा अत्यंत क्रोधित और दुखी हुई। उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने छल से मेरा सतीत्व भंग किया, उसी प्रकार आप पाषाण (पत्थर) बन जाएँ — यही श्राप विष्णु के शालिग्राम रूप का आधार माना जाता है। इसके पश्चात वृंदा ने स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया, और उसकी भस्म से जिस पौधे का जन्म हुआ, वह तुलसी कहलाया। वृंदा की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने वचन दिया कि वे प्रतिवर्ष शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह करेंगे और तुलसी सदैव उनके साथ पूजित होंगी। यही विवाह प्रतिवर्ष देव उठनी एकादशी अथवा द्वादशी तिथि को तुलसी विवाह के रूप में घर-घर में संपन्न किया जाता है।
पूजा का समय और विधि
देव उठनी एकादशी की पूजा प्रातः स्नान व व्रत-संकल्प से आरंभ होकर संध्याकाल तुलसी-विवाह व जागरण पर पूर्ण होती है। घर की महिलाएँ इस पूजा का नेतृत्व करती हैं, परंतु परिवार के सभी सदस्य इसमें सम्मिलित होते हैं।
- प्रातः सूर्योदय से पूर्व स्नान कर स्वच्छ (पीत/श्वेत) वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
- दिनभर निराहार अथवा फलाहार व्रत रखें — अन्न, चावल, दाल पूर्णतः वर्जित रहते हैं।
- घर के मुख्य द्वार से पूजा-स्थल तक चावल के आटे या हल्दी-चूने से भगवान विष्णु के पद-चिन्ह (पगल्या) बनाए जाते हैं।
- संध्याकाल सूर्यास्त के बाद आँगन या छत पर तुलसी के चौरे को गेरू व चावल के आटे से सजाया जाता है, और गन्ने-आँवले की डालियों से एक छोटा मंडप तैयार किया जाता है।
- तुलसी को दुल्हन की भांति लाल चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर और आभूषणों से सजाया जाता है; शालिग्राम या विष्णु प्रतिमा को वर के रूप में स्थापित किया जाता है।
- शंख और घंटी बजाकर, दीप जलाकर विधिवत तुलसी-शालिग्राम विवाह संपन्न कराया जाता है — जिसमें कन्यादान की भांति सभी रस्में निभाई जाती हैं।
- गन्ना, सिंघाड़ा, अमरूद, आँवला, बेर, शकरकंद जैसे मौसमी फल भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
- रात्रि जागरण करते हुए भजन-कीर्तन किया जाता है, और अगले दिन (द्वादशी) प्रातः विधिपूर्वक पारण कर व्रत पूर्ण किया जाता है।
पूजा सामग्री
भोग और फलाहार
देव उठनी एकादशी के फलाहार में अन्न पूर्णतः वर्जित रहता है, इसलिए भोग व भोजन दोनों मौसमी फल-कंद पर आधारित होते हैं:
- गन्ना, सिंघाड़ा, अमरूद, आँवला, बेर, शकरकंद — तुलसी विवाह के मुख्य भोग
- कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूड़ी/हलवा — फलाहार व्रत हेतु
- साबूदाना खिचड़ी
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से बना
- तुलसी-गुड़ की मिठाई
पारण के दिन (द्वादशी) सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत पूर्ण किया जाता है, और यथाशक्ति अन्न-वस्त्र का दान किया जाता है।
तुलसी विवाह — प्रबोधिनी एकादशी का मुख्य अनुष्ठान
तुलसी विवाह देव उठनी एकादशी अथवा उसके अगले दिन द्वादशी तिथि — 2026 में शनिवार, 21 नवंबर — को संध्याकाल संपन्न किया जाता है। यह विवाह किसी भी हिन्दू विवाह की भांति संपूर्ण विधि-विधान से होता है: तुलसी को दुल्हन और शालिग्राम को दूल्हा मानकर मंडप सजाया जाता है, कन्यादान होता है, फेरे कराए जाते हैं और मंगल-गीत गाए जाते हैं।
मान्यता है कि जो दंपति संतानहीन हों या जिनकी पुत्री न हो, वे तुलसी विवाह में कन्यादान कर उतना ही पुण्य अर्जित करते हैं जितना अपनी पुत्री का कन्यादान करने पर मिलता है। इसी दिन से हिन्दू विवाह-सीजन औपचारिक रूप से आरंभ माना जाता है।
विवाह-सीजन का शुभारंभ
चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के चार माह) में विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन, उपनयन जैसे सभी मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। देव उठनी एकादशी के साथ ही यह प्रतिबंध समाप्त होता है, और पंचांग में अगले दिनों से विवाह-मुहूर्त निकलने आरंभ हो जाते हैं। ध्यान रहे — देव उठनी एकादशी स्वयं विवाह की तिथि नहीं होती; यह केवल मुहूर्त-सीजन के द्वार खोलने वाला पर्व है। किसी विशेष विवाह हेतु सटीक शुभ तिथि व मुहूर्त वर-वधू की जन्म-कुंडली, नक्षत्र-मिलान और उस माह के पंचांग के आधार पर अलग से निर्धारित किया जाता है।
पर्व का महत्व
देव उठनी एकादशी का व्रत रखने और तुलसी-शालिग्राम विवाह संपन्न कराने से मान्यतानुसार —
- भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है
- घर-परिवार में सुख-समृद्धि व वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है
- कन्यादान के समान पुण्य-फल की प्राप्ति होती है
- पूर्व जन्मों व इस जन्म के पापों का नाश होकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है
यह पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि सृष्टि-चक्र में विश्राम के बाद पुनः सक्रियता, और परिवारों में मांगलिक उल्लास के पुनरारंभ का प्रतीक है।
क्षेत्रीय एवं वैकल्पिक नाम
यह एक ही पर्व है, पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है — देव उठनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी, हरिप्रबोधिनी एकादशी, कार्तिकी एकादशी, तथा नेपाल में इसे थुलो एकादशी कहा जाता है। सभी नाम एक ही भाव — भगवान विष्णु के जागरण — की ओर संकेत करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देव उठनी एकादशी 2026 का सही समय क्या है?
एकादशी तिथि 20 नवंबर 2026 प्रातः 07:16 बजे प्रारंभ होकर 21 नवंबर 2026 प्रातः 06:32 बजे तक रहेगी। स्मार्त/गृहस्थ परंपरा में व्रत 20 नवंबर (शुक्रवार) को और वैष्णव संप्रदाय में 21 नवंबर (शनिवार) को रखा जाएगा।
2026 में कुल कितनी एकादशी हैं?
2026 में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कारण कुल 24 एकादशी व्रत हैं, जबकि सामान्य वर्ष में 23 एकादशी होती हैं।
क्या देव उठनी एकादशी विवाह के लिए शुभ है?
हाँ, इसी दिन से चातुर्मास समाप्त होकर विवाह-मुहूर्त सीजन का शुभारंभ माना जाता है। सटीक विवाह-मुहूर्त कुंडली व पंचांग अनुसार अलग से देखा जाता है।
देव उठनी एकादशी कब करनी चाहिए?
2026 में स्मार्त परंपरा अनुसार 20 नवंबर को व्रत रखें, पारण 21 नवंबर दोपहर 01:11 से 03:18 बजे के बीच करें। वैष्णव परंपरा अनुसार व्रत 21 नवंबर को रखा जाएगा, पारण 22 नवंबर प्रातः 06:49 से 08:56 बजे के मध्य होगा।
देव उठनी एकादशी पर क्या करना चाहिए?
प्रातः स्नान कर व्रत-संकल्प लें, दिनभर फलाहार व्रत रखें, संध्याकाल तुलसी-शालिग्राम विवाह कराएं, शंख-घंटी बजाकर भगवान को जगाएं, भजन-कीर्तन करें और अगले दिन विधिपूर्वक पारण करें।
2026 में पहली बार एकादशी व्रत कब से शुरू करें?
एकादशी व्रत आरंभ की कोई एक निश्चित तिथि शास्त्रों में तय नहीं है। किसी भी शुक्ल पक्ष की एकादशी से संकल्प लेकर व्रत शुरू किया जा सकता है। देव उठनी एकादशी या मार्गशीर्ष की मोक्षदा एकादशी को नए व्रत का शुभारंभ करना विशेष शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दोनों मांगलिक कार्यों के प्रारंभ से जुड़ी हैं।
क्या 29 मार्च 2026 को एकादशी है?
हाँ, 29 मार्च 2026 (रविवार) को चैत्र शुक्ल एकादशी है, जिसे कामदा एकादशी कहा जाता है। व्रत 29 मार्च को रखा जाएगा।
एकादशी के दिन कौन-से भोजन वर्जित हैं?
चावल, गेहूं, जौ, बाजरा जैसे सभी अनाज, दाल-चना, बैंगन, प्याज-लहसुन और मांस-मदिरा वर्जित माने जाते हैं। फलाहार में सिंघाड़े का आटा, कुट्टू, समक चावल, साबूदाना, दूध-दही, मौसमी फल और सूखे मेवे लिए जा सकते हैं।
क्या एकादशी के दिन बाल धो सकते हैं?
हाँ, स्नान व बाल धोना वर्जित नहीं है। पारंपरिक मान्यता अनुसार बाल कटवाना, नाखून काटना, शेविंग करना और तेल-मालिश से बचा जाता है, क्योंकि इन्हें अशुभ कर्म माना गया है।
एकादशी व्रत कौन नहीं कर सकता?
गंभीर बीमार, अत्यंत वृद्ध, छोटे बच्चे और चिकित्सकीय कारणों से निराहार न रह सकने वाले लोग निर्जला व्रत की बजाय फलाहार अथवा एक समय भोजन कर आंशिक व्रत रख सकते हैं। गर्भवती स्त्रियाँ भी फलाहार व्रत रख सकती हैं।
सबसे शक्तिशाली एकादशी कौन-सी मानी जाती है?
निर्जला एकादशी (भीमसेनी एकादशी) को सबसे कठिन व सबसे शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि इसमें जल भी वर्जित होता है। मान्यता है कि इसे विधिपूर्वक करने से वर्षभर की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है।
स्मार्त और वैष्णव तिथि में अंतर क्यों होता है?
जब एकादशी तिथि सूर्योदय को स्पर्श नहीं करती (क्षय तिथि), तो स्मार्त परंपरा उस दिन व्रत रखती है जिस दिन एकादशी तिथि अधिक समय प्रचलित रहती है, जबकि वैष्णव परंपरा दशमी तिथि के लेशमात्र स्पर्श से भी बचने हेतु अगले दिन व्रत रखती है। 2026 में यही कारण है कि स्मार्त 20 नवंबर और वैष्णव 21 नवंबर को व्रत रखेंगे।
देव उठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों किया जाता है?
पौराणिक कथा अनुसार तुलसी माता वृंदा के रूप में भगवान विष्णु की परम भक्त थीं और विष्णु ने उन्हें शालिग्राम रूप में हर वर्ष विवाह करने का वचन दिया था। यह विवाह देव उठनी एकादशी या द्वादशी तिथि को संपन्न किया जाता है और इसी से विवाह-सीजन का शुभारंभ माना जाता है।