मिथिलांचल · आश्विन शुक्ल पूर्णिमा

कोजागरा (शरद पूर्णिमा)

देवी लक्ष्मी, अन्नपूर्णा एवं चंद्रदेव को समर्पित मिथिला के नवविवाहित वरों का पारंपरिक संस्कार-पर्व — सुख, समृद्धि और दीर्घायु के लिए

🌕 वर्ष 2026 में कोजागरा — 25 अक्टूबर, रविवार

मिथिला शैली में — पूर्ण चंद्रमा की अमृत-किरणों तले, गजलक्ष्मी अपने कमलासन पर विराजमान

संक्षिप्त परिचय

पर्व का नाम कोजागरा (शरद पूर्णिमा)
अन्य नाम कोजागर पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा
अंग्रेज़ी नाम Kojagra / Kojagara Festival
धर्म हिन्दू धर्म
क्षेत्र मिथिलांचल (बिहार), नेपाल का तराई क्षेत्र तथा विश्वभर के मैथिल ब्राह्मण एवं कायस्थ समुदाय
प्रमुख देवी-देवता देवी लक्ष्मी (अन्नपूर्णा स्वरूप में) एवं चंद्रदेव
पूजन का उद्देश्य नवविवाहित वर के दाम्पत्य जीवन का मंगल, दीर्घायु, आरोग्य तथा घर में अन्न-धन की कभी कमी न होना
कौन मनाते हैं? विशेषतः वे नवविवाहित वर जिनके विवाहित जीवन का यह पहला कोजागरा हो, तथा समूचा मैथिल समाज
हिन्दू माह आश्विन मास
पक्ष शुक्ल पक्ष
तिथि पूर्णिमा
2026 की तिथि 25 अक्टूबर 2026 (रविवार)
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 25 अक्टूबर 2026, प्रातः 11:55 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त 26 अक्टूबर 2026, प्रातः 09:41 बजे
चंद्रोदय 25 अक्टूबर 2026, सायं 05:00 बजे (नई दिल्ली)
पूजा का शुभ समय रात्रि में, चंद्रोदय के पश्चात — निशीथ काल तक (स्थानीय पंचांग अनुसार)
मुख्य प्रसाद मखाना खीर, बताशा, दही-चूड़ा, पान, नारियल एवं मौसमी फल
विशेष परंपरा ससुराल से वर के घर बहार (डाला) में मखाना, पान, वस्त्र, फल भेजना; चुमावन एवं पचीसी का खेल
मुख्य मान्यता इस रात्रि चंद्रमा की किरणों से अमृत वर्षा होती है, तथा देवी अन्नपूर्णा घर में निवास करने आती हैं
महत्व यह नवविवाहित वर के लिए मिथिला का प्रमुख संस्कार-पर्व है, जो सामाजिक सद्भाव एवं पारिवारिक समृद्धि का प्रतीक भी है

कोजागरा और शरद पूर्णिमा — एक जैसा नहीं है

पूरे भारत में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में लक्ष्मी-पूजा व चांदनी में खीर रखने के व्रत के रूप में मनाया जाता है। मिथिला में यही तिथि कोजागरा नाम से एक विशिष्ट रूप लेती है — यह मुख्यतः मैथिल ब्राह्मण एवं कायस्थ समाज में नवविवाहित वर के लिए किया जाने वाला संस्कार है, जिसमें ससुराल से बहार आना, चुमावन, दुर्वाक्षत मंत्र और पचीसी के खेल जैसी क्षेत्रीय परंपराएँ जुड़ी हैं। तिथि एक ही है, पर स्वरूप अलग।

मूल कथा — राजा जनक, समुद्र मंथन और लक्ष्मी

मैथिली लोक-परंपरा

मिथिला में कोजागरा मनाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। कथा के अनुसार त्रेतायुग में स्वयं राजा जनक ने अपने जामाता भगवान श्रीराम के लिए सबसे पहला कोजागरा संपन्न कराया था। राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता एवं दामाद श्रीराम के लिए पान, केला, मखाना और लड्डू जैसे उपहार भेजे — तभी से मिथिला में यह पर्व वर के घर उपहार भेजने की परंपरा के साथ मनाया जाता आ रहा है।

समुद्र मंथन और देवी लक्ष्मी का प्राकट्य

पौराणिक संदर्भ

पुराणों के अनुसार देवताओं व असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से जो चौदह रत्न निकले, उनमें देवी लक्ष्मी भी इसी आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रकट हुई थीं। इसी मंथन से चंद्रदेव भी उत्पन्न हुए थे, इसलिए लक्ष्मी और चंद्रमा को भाई-बहन माना जाता है। यही कारण है कि कोजागरा की रात्रि में लक्ष्मी के साथ चंद्रदेव की भी विशेष पूजा होती है, और उनकी किरणों को औषधीय व अमृततुल्य माना जाता है।

"को जागर्ति" — कौन जाग रहा है?

कोजागरा शब्द संस्कृत के "को जागर्ति" से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है — "कौन जाग रहा है?" मान्यता है कि इस रात्रि देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए यह प्रश्न पूछती हैं, और जो लोग जागकर श्रद्धापूर्वक उनकी अाराधना करते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि का वरदान मिलता है। इसीलिए यह रात्रि-जागरण का पर्व भी माना जाता है।

पूजा का समय और विधि

कोजागरा की रस्में संध्याकाल से आरंभ होकर रात्रि में चंद्रोदय के बाद तक चलती हैं। यह विशेष रूप से नवविवाहित वर के घर में मनाया जाता है, विशेषकर जिनके वैवाहिक जीवन का यह पहला कोजागरा हो।

  1. ससुराल पक्ष से नवविवाहित वर के घर बहार (डाला) आती है, जिसमें पान, मखाना, नारियल, केला, नया वस्त्र, पाग तथा मिठाई सजाकर भेजी जाती है।
  2. घर की महिलाएँ आँगन में अष्टदल कमल का अरिपन (चावल के आटे से बनी अल्पना) बनाकर वर का चुमावन करती हैं — दीप, दूब-अक्षत और रोरी से मंगल-आशीर्वाद दिया जाता है।
  3. परिवार व समाज के कम-से-कम पाँच वरिष्ठजन दुर्वाक्षत मंत्र पढ़कर वर को आशीर्वाद देते हैं।
  4. चुमावन के पश्चात वर अपने साले के साथ पचीसी (चौसर) का खेल खेलता है — इसमें प्रयुक्त कौड़ी और पासा ससुराल से ही आते हैं। हारने वाला जीतने वाले को उपहार भेंट करता है, और महिलाएँ साथ में मैथिली लोकगीत गाती हैं।
  5. रात्रि में मखाना खीर या भूजा बनाकर खुले आँगन में चांदनी तले रखा जाता है, ताकि वह चंद्रमा की अमृत-किरणों से पूर्ण हो जाए।
  6. देवी अन्नपूर्णा स्वरूप में लक्ष्मी तथा चंद्रदेव की पूजा होती है, जिससे विश्वास है कि उस रात्रि से देवी घर में निवास करने आती हैं।
  7. रात्रि में चांदनी में रखी मखाना खीर वर को खिलाई जाती है, तथा परिवार में ब्राह्मण-भोज का आयोजन भी होता है।

पूजा सामग्री

मखानापानबताशानारियल केलानया वस्त्रपागकौड़ी पासा (गोटी)दहीचूड़ाचावल दूधचीनीगौर चावल का आटाअष्टदल (अल्पना) दूर्वा दलअक्षतसिंदूर/रोरीसुपारी कलशदीपधूप-अगरबत्तीसफेद फूल-माला

भोग और पारंपरिक पकवान

कोजागरा का भोग चांदनी और अमृत की मान्यता से गहरे जुड़ा है — मुख्य आकर्षण घर की रसोई में ही बनने वाले पकवान होते हैं:

चांदनी में रखी मखाना खीर को अगली सुबह प्रसाद रूप में नवविवाहित वर को खिलाया जाता है — मिथिला के हर घर में यह दृश्य पूर्णिमा की रात्रि एक जैसा दिखता है।

पर्व का महत्व

मिथिला में मान्यता है कि जो नवविवाहित वर विधिपूर्वक कोजागरा संस्कार सम्पन्न कराता और देवी लक्ष्मी-अन्नपूर्णा तथा चंद्रदेव की पूजा करता है, उसे —

यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मैथिल पारिवारिक संस्कृति, दो परिवारों के मध्य सामाजिक सद्भाव तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही अरिपन, चुमावन और पचीसी जैसी लोक-परंपराओं को भी जीवित रखता है। शरद ऋतु के आरंभ में मनाया जाने वाला यह पर्व वर्षा-काल की समाप्ति और आकाश के निर्मल होने का भी प्रतीक है, जब चंद्र-किरणों का औषधीय प्रभाव सर्वाधिक माना जाता है।

क्षेत्रीय नाम

यह एक ही तिथि — आश्विन शुक्ल पूर्णिमा — से जुड़ा पर्व भारत के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों और स्वरूपों में मनाया जाता है — मिथिला में कोजागरा, सामान्य हिन्दी क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा, पूर्वी भारत (बंगाल-ओडिशा) में कोजागरी लक्ष्मी पूजा, तथा वैष्णव परंपरा में रास पूर्णिमा (श्रीकृष्ण की महारास लीला से संबद्ध)। सभी नाम एक ही पूर्णिमा तिथि की अलग-अलग क्षेत्रीय अभिव्यक्तियाँ हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोजागरा और शरद पूर्णिमा में क्या फर्क है?

तिथि एक ही है, पर शरद पूर्णिमा पूरे भारत में मनाई जाने वाली लक्ष्मी-पूजा है, जबकि कोजागरा मिथिला में नवविवाहित वर के लिए किया जाने वाला विशिष्ट संस्कार है।

कोजागरा 2026 में कब है?

रविवार, 25 अक्टूबर 2026 — आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के दिन।

कोजागरा किनके लिए विशेष है?

मुख्यतः उन नवविवाहित वरों के लिए जिनके वैवाहिक जीवन का यह पहला कोजागरा हो, हालांकि पूरा मैथिल समाज इसमें सम्मिलित होता है।

मखाना खीर चांदनी में क्यों रखी जाती है?

मान्यता है कि इस रात्रि चंद्र-किरणों से अमृत की वर्षा होती है, जिससे चांदनी में रखा भोजन अमृततुल्य होकर आरोग्य व दीर्घायु प्रदान करता है।

चुमावन और पचीसी क्या हैं?

चुमावन महिलाओं द्वारा किया जाने वाला मांगलिक आशीर्वाद-रस्म है; पचीसी वर और साले के बीच खेला जाने वाला पारंपरिक चौसर खेल है, जिसमें सामग्री ससुराल से आती है।