नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की !
तिथि, निशिता पूजा मुहूर्त, जन्म कथा, घर पर पूजा विधि और पाठ हेतु सम्पूर्ण स्तोत्र संग्रह
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि के निशिता काल में हुआ था, इसलिए मुख्य पूजा भी इसी समय की जाती है।
अंधकार से आलोक की ओर — कंस के कारागार में जन्मे उस दिव्य शिशु की कथा, जिसने धरती से अधर्म का भार हर लिया।
मथुरा के राजा कंस अत्यंत अत्याचारी था। जब उसने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से किया, तो विदाई के समय आकाशवाणी हुई — "हे कंस! जिस देवकी को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसकी आठवीं संतान ही तेरे वध का कारण बनेगी।" यह सुनते ही कंस भयभीत हो उठा और उसने देवकी-वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया।
एक-एक कर कंस ने देवकी की छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला। सातवाँ गर्भ योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ से वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया — यही बालक बलराम कहलाए। फिर भाद्रपद माह की कृष्ण अष्टमी की अंधेरी, वर्षा से भीगी रात्रि में, ठीक मध्यरात्रि के समय, स्वयं भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से चतुर्भुज रूप में जन्म लिया।
"जब-जब होई धरम की हानि। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥ तब-तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥"
वसुदेव ने उस दिव्य बालक को देखा तो कारागार की बेड़ियाँ स्वयं खुल गईं, पहरेदार गहरी नींद में सो गए और सभी द्वार अपने-आप खुल गए। भगवान की ही आज्ञा से वसुदेव उस नवजात शिशु को टोकरी में रखकर घनघोर वर्षा में यमुना नदी पार करने चले। जब जल शिशु के चरणों को छूने लगा, तब शेषनाग ने अपने फणों से बालक पर छत्र कर दिया और यमुना ने स्वयं मार्ग दे दिया।
गोकुल पहुँचकर वसुदेव ने नंद बाबा के घर सोई हुई यशोदा के पास अपने पुत्र को रख दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर पुनः मथुरा के कारागार लौट आए। यह कन्या साक्षात योगमाया — देवी शक्ति का ही स्वरूप थीं। जब कंस को समाचार मिला और उसने उस कन्या का वध करने का प्रयत्न किया, तो वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में विराजमान हो गई और अपने वास्तविक देवी रूप में प्रकट होकर बोली — "हे कंस! तुझे मारने वाला अन्यत्र सुरक्षित पल रहा है।" इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण गोकुल में नंद-यशोदा के लाडले "कान्हा" बनकर पले-बढ़े, और आगे चलकर उसी अत्याचारी कंस का वध कर धरती से अधर्म का भार उतार दिया।
व्रत मध्यरात्रि की पूजा के पश्चात् प्रसाद ग्रहण कर, या अगले दिन 5 सितम्बर, प्रातः 11:23 बजे के बाद अष्टमी तिथि समाप्त होने पर तोड़ा जा सकता है। व्रत की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण है भक्ति की सच्चाई।
प्रातः संकल्प से लेकर मध्यरात्रि के जन्मोत्सव तक — सम्पूर्ण विधि चरणबद्ध रूप में।
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर जन्माष्टमी व्रत व पूजा का संकल्प लें। घर व पूजा स्थल की सफाई कर रंगोली सजाएँ।
बाल गोपाल के लिए एक छोटा झूला या पालना तैयार करें। इसे फूलों, तोरण एवं रंगीन वस्त्रों से सजाएँ। पूजा चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर लड्डू गोपाल की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
दिनभर व्रत रखते हुए भजन-कीर्तन करें। सायंकाल पंचामृत, भोग सामग्री, वस्त्र, आभूषण एवं आरती की सामग्री एकत्र करें।
ठीक मध्यरात्रि में शंख व घंटी बजाकर "जय कन्हैया लाल की" के जयघोष के साथ बाल गोपाल का जन्म मनाएँ। इसी समय मुख्य पूजा प्रारम्भ करें।
दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से बने पंचामृत से लड्डू गोपाल को स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर स्वच्छ वस्त्र से पोंछें।
पीतांबर वस्त्र, मुकुट, मोरपंख, बांसुरी व आभूषणों से श्रृंगार करें। चंदन-रोली का तिलक लगाकर तुलसी दल अर्पित करें। तत्पश्चात् बालक को सजे हुए झूले में झुलाएँ।
माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, खीर, पंचमेवा एवं ऋतुफल का भोग अर्पित करें। भोग में तुलसी पत्र अवश्य रखें, क्योंकि इसके बिना भोग अपूर्ण माना जाता है।
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" अथवा कृष्ण मूल मंत्र का जाप करें। नीचे दिए गए कृष्णाष्टकम्, दामोदराष्टकम् अथवा जन्माष्टमी व्रत कथा में से कोई एक पाठ करें।
घी के दीपक से "आरती कुंजबिहारी की" गाकर आरती करें, शंखनाद करें एवं परिवार सहित परिक्रमा करें। तत्पश्चात् सभी को प्रसाद वितरित करें।
मध्यरात्रि की पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ा जा सकता है, अथवा अगले दिन 5 सितम्बर प्रातः 11:23 बजे अष्टमी तिथि समाप्त होने पर पारण करें।
निशिता पूजा के समय अथवा दिनभर के व्रत में इनमें से कोई भी एक या अधिक पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
श्रीकृष्ण के जन्म की सम्पूर्ण कथा — मूल पौराणिक स्वरूप में, पूजा के साथ पढ़ने योग्य। पूजा-आरम्भ से पूर्व अथवा निशिता काल में सुनना/पढ़ना शुभ माना गया है।
पूर्ण कथा पढ़ें →आठ श्लोकों का यह भावपूर्ण स्तोत्र श्रीकृष्ण के बाल-स्वरूप, वेणु-नाद व गोपियों संग रासलीला का सुंदर वर्णन करता है। नित्य पाठ से चित्त में कृष्ण-भक्ति का उदय होता है।
पूर्ण पाठ पढ़ें →बाल कृष्ण की दामोदर लीला (माँ यशोदा द्वारा ऊखल से बाँधे जाने) पर आधारित यह स्तोत्र भक्ति व वात्सल्य रस से परिपूर्ण है। घी के दीपक से आरती करते समय इसका पाठ विशेष फलदायी है।
पूर्ण पाठ पढ़ें →भगवान अच्युत (कृष्ण) के अनंत, अविनाशी स्वरूप की स्तुति। शांति व मानसिक स्थिरता हेतु यह पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
पूर्ण पाठ पढ़ें →श्रीकृष्ण के मनमोहक बाल-रूप का ध्यान करते हुए किया जाने वाला संक्षिप्त किन्तु अत्यंत मधुर स्तोत्र — विशेषकर झूला-सेवा के समय पाठ हेतु उपयुक्त।
पूर्ण पाठ पढ़ें →चालीस चौपाइयों में रचित यह चालीसा हिंदी में सरल व सुगम है, जिसे पूरा परिवार मिलकर सामूहिक रूप से गा सकता है। घर की पूजा में सर्वाधिक लोकप्रिय पाठ।
पूर्ण पाठ पढ़ें →निशिता पूजा के समापन पर गाई जाने वाली प्रसिद्ध आरती। पूरे परिवार सहित दीपक की परिक्रमा करते हुए इसे गाना जन्मोत्सव का सबसे भावुक क्षण होता है।
पूर्ण आरती पढ़ें →स्वयं श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकली गीता का पाठ जन्माष्टमी पर विशेष पुण्यदायी माना गया है। कर्मयोग (अ. 4), विभूतियोग (अ. 10) व पुरुषोत्तमयोग (अ. 15) का पाठ करें।
अध्याय पढ़ें →चूँकि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के पूर्णावतार हैं, अतः विष्णु सहस्रनाम का पाठ जन्माष्टमी पर करने से समस्त पापों का नाश व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
पूर्ण पाठ पढ़ें →स्मार्त संप्रदाय (अधिकांश गृहस्थ परिवार) 4 सितम्बर 2026, शुक्रवार को व्रत व पूजा करेंगे, क्योंकि इस दिन मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि विद्यमान है। वैष्णव संप्रदाय व अधिकांश मंदिर 5 सितम्बर को मनाएँगे, जब सूर्योदय के समय अष्टमी व रोहिणी नक्षत्र दोनों उपस्थित हैं।
2026 में निशिता पूजा मुहूर्त रात्रि 11:57 बजे से 12:43 बजे तक (4–5 सितम्बर की मध्यरात्रि) है। यही वह समय है जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ माना जाता है, अतः मुख्य पूजा इसी समय की जाती है।
व्रत का पारण 5 सितम्बर 2026 को प्रातः 11:23 बजे के बाद, जब अष्टमी तिथि समाप्त हो जाए, करना चाहिए। कई भक्त मध्यरात्रि की पूजा के तुरंत बाद प्रसाद ग्रहण कर भी व्रत तोड़ लेते हैं — यह भी मान्य है।
लड्डू गोपाल की प्रतिमा, झूला, पीतांबर वस्त्र, पंचामृत (दूध-दही-घी-शहद-शक्कर), तुलसी दल, चंदन-रोली, माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी, फल एवं दीपक — ये मुख्य सामग्री हैं। पूरी सूची इस पृष्ठ पर ऊपर दी गई है।
जन्माष्टमी व्रत कथा, श्रीकृष्णाष्टकम्, दामोदराष्टकम्, कृष्ण चालीसा अथवा श्रीमद्भगवद्गीता के चयनित अध्यायों (4, 10, 15) में से कोई भी एक या अधिक पाठ किया जा सकता है। पूर्ण स्तोत्र संग्रह इस पृष्ठ पर ऊपर उपलब्ध है।