देवराज इन्द्र द्वारा रचित — ब्रह्मवैवर्त पुराण से उद्धृत
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जब देवराज इन्द्र ने भगवान श्रीकृष्ण के परम तेजोमय स्वरूप तथा युग-युग में उनके भिन्न-भिन्न वर्णों एवं लीलाओं को देखा, तो भय और भक्ति से विभोर होकर उन्होंने इस स्तोत्र की रचना की। यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है और गुरु-शिष्य परम्परा से अंगिरा ऋषि तक पहुँचा।
फलश्रुति
जो भक्त श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक इस इन्द्रकृत श्रीकृष्ण स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह इस लोक में दृढ़ भक्ति प्राप्त कर अंततः भगवान की दास्य भक्ति को प्राप्त होता है। ऐसा साधक जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और शोक से सदा के लिए मुक्त हो जाता है, और स्वप्न में भी उसे यमदूत अथवा यमलोक के दर्शन नहीं होते।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रीकृष्ण स्तोत्रम् (इन्द्रकृतम्) किसने रचा है?
इस स्तोत्र की रचना देवराज इन्द्र ने की थी, जब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न युगों में धारण किए गए स्वरूपों और उनकी लीलाओं का वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की। यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है।
इस स्तोत्र के पाठ का क्या लाभ है?
स्तोत्र के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इसका नित्य पाठ करता है, वह जन्म-मृत्यु, जरा, व्याधि और शोक से मुक्त हो जाता है तथा अंत में भगवान की दास्य भक्ति प्राप्त करता है।
इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
इस स्तोत्र में 22 श्लोक हैं, जिनमें भगवान श्रीकृष्ण के सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग में धारण किए गए स्वरूपों तथा वृन्दावन की विभिन्न लीलाओं का वर्णन है।