शरीर शुद्धि मंत्र

Sharir Shuddhi Mantra · अपवित्रः पवित्रो वा (अर्थ एवं विधि सहित)

किसी भी पूजा-पाठ, हवन या संस्कार को आरंभ करने से पूर्व शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक मानी गई है। इसी हेतु "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा" मंत्र पढ़ा जाता है, जिसमें भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से बाह्य और आंतरिक शुद्धि होने की बात कही गई है। नीचे यह मंत्र संस्कृत, शब्दार्थ, भावार्थ और विधि सहित दिया गया है।

पूजा प्रारंभ मंत्र

शरीर शुद्धि मंत्र

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

Om Apavitraḥ Pavitro Vā Sarvāvasthāṁ Gato'pi Vā।
Yaḥ Smaretpuṇḍarīkākṣaṁ Sa Bāhyābhyantaraḥ Śuciḥ।।

शब्दार्थ

अपवित्रःअशुद्ध, अपवित्र
पवित्रो वाअथवा पवित्र, शुद्ध
सर्वावस्थां गतोऽपि वाचाहे किसी भी अवस्था से गुजरा हो
यः स्मरेत्जो कोई भी स्मरण करता है
पुण्डरीकाक्षंकमल के समान नेत्रों वाले भगवान विष्णु को
स बाह्याभ्यन्तरः शुचिःवह बाहर और भीतर दोनों से शुद्ध हो जाता है

भावार्थ

चाहे कोई व्यक्ति किसी कारणवश अपवित्र हो अथवा पवित्र हो, चाहे वह किसी भी स्थिति या अवस्था से होकर गुजरा हो — जो भी व्यक्ति कमल-नयन भगवान विष्णु (पुण्डरीकाक्ष) का स्मरण करता है, वह उसी क्षण बाहर से (शरीर से) और भीतर से (मन से) पूर्णतः शुद्ध हो जाता है।

शरीर शुद्धि मंत्र का महत्व

हिन्दू पूजा-पद्धति में किसी भी अनुष्ठान से पूर्व शरीर, मन और स्थान की शुद्धि पर विशेष बल दिया गया है। "अपवित्रः पवित्रो वा" मंत्र यह भाव व्यक्त करता है कि बाहरी शुद्धता (स्नान, वस्त्र) से बढ़कर आंतरिक शुद्धता महत्वपूर्ण है, और यह आंतरिक शुद्धता ईश्वर के स्मरण मात्र से प्राप्त हो सकती है। इसी कारण यह मंत्र किसी भी अवस्था में — चाहे व्यक्ति ने स्नान किया हो या न किया हो, किसी अशुद्ध वस्तु का स्पर्श हुआ हो या न हुआ हो — पढ़ा जा सकता है।

यह मंत्र भगवान विष्णु को "पुण्डरीकाक्ष" कहकर संबोधित करता है, अर्थात जिनके नेत्र कमल के समान सुंदर और शीतल हैं। इस मंत्र के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि ईश्वर की भक्ति और स्मरण किसी भी बाह्य अशुद्धता से बड़ी शक्ति रखते हैं, और सच्चे मन से किया गया स्मरण व्यक्ति को हर स्थिति में शुद्ध बना देता है।

शरीर शुद्धि मंत्र पढ़ने की विधि

  1. पूजा स्थल पर आसन बिछाकर बैठें और आसन पर जल छिड़क कर आसन शुद्धि करें।
  2. दोनों हाथ जोड़कर या दायें हाथ में जल लेकर भगवान विष्णु का ध्यान करें।
  3. शांत मन से "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा" मंत्र का उच्चारण करें।
  4. दूसरी पंक्ति "यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः" पढ़ते हुए अपने ऊपर जल का आचमन अथवा प्रोक्षण करें।
  5. मंत्रोच्चार के पश्चात पूजा की अगली विधि (संकल्प, आवाहन आदि) प्रारंभ करें।
ध्यान दें: यह मंत्र लगभग हर पूजा-विधि में आरंभिक चरण के रूप में प्रयुक्त होता है, चाहे पूजा किसी भी देवी-देवता की क्यों न हो, क्योंकि यह केवल शरीर एवं मन की शुद्धि के लिए पढ़ा जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शरीर शुद्धि मंत्र कब पढ़ा जाता है?

किसी भी पूजा, हवन, संस्कार या शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले, आसन ग्रहण करने के तुरंत बाद स्वयं की शुद्धि के लिए।

अपवित्रः पवित्रो वा मंत्र किस देवता को समर्पित है?

यह मंत्र भगवान विष्णु को समर्पित है, जिन्हें मंत्र में "पुण्डरीकाक्ष" (कमल-नयन) कहा गया है।

यह मंत्र किसी भी अवस्था में क्यों पढ़ा जा सकता है?

मंत्र के अनुसार व्यक्ति चाहे शुद्ध हो या अशुद्ध, किसी भी अवस्था से गुजरा हो, भगवान विष्णु के स्मरण मात्र से वह बाह्य और आंतरिक रूप से शुद्ध हो जाता है।

क्या इस मंत्र से पहले या बाद में कोई अन्य विधि करनी होती है?

सामान्यतः पहले आसन शुद्धि की जाती है, फिर यह मंत्र पढ़कर स्वयं की शुद्धि की जाती है, उसके बाद पूजा का संकल्प लिया जाता है।