यज्ञोपवीत मंत्र – जनेऊ मंत्र

Yagyopavit Mantra · Janeu Mantra (with Meaning & Vidhi)

यज्ञोपवीत, जिसे सामान्यतः जनेऊ कहा जाता है, हिन्दू धर्म के उपनयन संस्कार में धारण किया जाने वाला पवित्र सूत्र है। यह ज्ञान, कर्तव्य और ब्रह्मचर्य का प्रतीक माना गया है। नीचे वाजसनेयि यज्ञोपवीत मंत्र तथा छान्दोग्य जनेऊ मंत्र संस्कृत, हिंदी अर्थ और विधि सहित दिए गए हैं।

शुक्ल यजुर्वेद परंपरा

वाजसनेयि यज्ञोपवीत मंत्र

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

Om Yajñopavītaṁ Paramaṁ Pavitraṁ Prajāpateryatsahajaṁ Purastāt।
Āyuṣyamagryaṁ Pratimuñca Śubhraṁ Yajñopavītaṁ Balamastu Tejaḥ।।

शब्दार्थ एवं भावार्थ

यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है, जो प्रजापति (सृष्टिकर्ता) के साथ ही प्रारम्भ से उत्पन्न हुआ है। मैं इस उज्ज्वल, दीर्घायु प्रदान करने वाले यज्ञोपवीत को धारण करता हूँ — यह मुझे बल और तेज प्रदान करे।

सामवेद परंपरा

छान्दोग्य जनेऊ मंत्र

ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीतेनोपनह्यामि।

Om Yajñopavītamasi Yajñasya Tvopavītenopanahyāmi।

शब्दार्थ एवं भावार्थ

हे यज्ञोपवीत! तू यज्ञ का स्वरूप है। मैं तुझे यज्ञ के उपवीत (सूत्र) से धारण करता हूँ। इस मंत्र के द्वारा जनेऊ को यज्ञ-कर्म का अभिन्न अंग स्वीकार कर धारण किया जाता है।

यज्ञोपवीत मंत्र का महत्व

यज्ञोपवीत केवल एक धागा नहीं बल्कि तीन गुणों — सत्व, रज और तम — तथा तीन ऋणों — देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण के प्रति दायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसे धारण करते समय बोले जाने वाले मंत्र व्यक्ति को स्मरण कराते हैं कि यह सूत्र केवल वस्त्र का भाग नहीं, बल्कि आजीवन कर्तव्य-पालन, ब्रह्मचर्य और अनुशासन का वाहक है।

वाजसनेयि यज्ञोपवीत मंत्र में दीर्घायु, तेज और बल की प्रार्थना की जाती है, जबकि छान्दोग्य जनेऊ मंत्र में इसे सीधे यज्ञ-स्वरूप मानकर धारण किया जाता है। दोनों मंत्र वैदिक शाखाओं (यजुर्वेद व सामवेद) की भिन्न परंपराओं को दर्शाते हैं, किंतु भावना एक ही है — पवित्रता और कर्तव्यबोध।

यज्ञोपवीत धारण विधि

  1. प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  2. पूर्व दिशा या ईशान कोण की ओर मुख करके बैठें।
  3. गणेश वंदना एवं संकल्प मंत्र का उच्चारण करें।
  4. नया यज्ञोपवीत हाथ में लेकर वाजसनेयि अथवा छान्दोग्य मंत्र का उच्चारण करते हुए धारण करें।
  5. पुराना यज्ञोपवीत उतारते समय पृथक विसर्जन मंत्र बोलें।
  6. अंत में आचमन कर गुरुजनों तथा इष्टदेव को प्रणाम करें।
ध्यान दें: यज्ञोपवीत धारण/परिवर्तन श्रावणी उपाकर्म (रक्षाबंधन तिथि), उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार अथवा जनेऊ के अपवित्र या टूट जाने पर किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यज्ञोपवीत मंत्र कब बोला जाता है?

उपनयन संस्कार, नया जनेऊ धारण करते समय, तथा प्रतिवर्ष श्रावणी उपाकर्म के दिन।

वाजसनेयि और छान्दोग्य यज्ञोपवीत मंत्र में क्या अंतर है?

वाजसनेयि मंत्र शुक्ल यजुर्वेद परंपरा से है और दीर्घायु-बल की कामना करता है; छान्दोग्य मंत्र सामवेद परंपरा से है और यज्ञोपवीत को यज्ञ-स्वरूप मानकर संक्षेप में पढ़ा जाता है।

यज्ञोपवीत धारण करने से पहले शुद्धि क्यों आवश्यक है?

यज्ञोपवीत पवित्रता और ब्रह्मचर्य का प्रतीक है, इसलिए स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना और संकल्प लेना आवश्यक बताया गया है।

पुराना जनेऊ कैसे उतारें?

नया यज्ञोपवीत धारण करने के बाद पुराना जनेऊ अलग विसर्जन मंत्र बोलते हुए उतारा जाता है।