श्रीगणेशाय नमः श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः

श्रीरामचरितमानस

(सुन्दरकाण्ड) • पाठ जारी
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कवि परिचय

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस भक्ति, ज्ञान और मर्यादा का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें श्रीराम की कथा लोकभाषा में अत्यंत सुंदर रूप से प्रस्तुत की गई है।

श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघे निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्याशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरि वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
निर्भरां मे मानसं च ॥ २ ॥
भक्ति प्रयच्छ रघुपुङ्गव कामादिदोषरहितं कुरु ।
अतुलितबलधार्म दनुजवनकृशानु सकलगुणनिधानं ।
रघुपतिप्रियभक्तं हेमशैलाभदेहं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
वानराणामधीशं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥
चौपाई
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
चौपाई
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सैभारी।
तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
जेहि गिरि चरन देइ हनुमंता।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि प्रनाम।
दोहा
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह श्रमहारी॥
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥ १ ॥