श्रीगणेशाय नमः श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः

श्रीरामचरितमानस

(सुन्दरकाण्ड) • पृष्ठ ६
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कवि परिचय

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस भक्ति, ज्ञान और मर्यादा का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें श्रीराम की कथा लोकभाषा में अत्यंत सुंदर रूप से प्रस्तुत की गई है।

चौपाई
३४
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा।
जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा।
कहा चलें कर करहु बनावा॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे।
तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी।
नभ तें भवन चले सुर हरषी॥
दोहा
३४
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ बरूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु प्रभु पद पंकज नावहिं सीस॥ ३४ ॥
चौपाई
३४
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा।
गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना।
चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा।
भए पच्छजुत मनहुँ गिरिदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना।
सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
जासु सकल मंगलमय कीती।
तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं।
फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई।
असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटकु को बरनै पारा।
गर्जहिं बानर भालु अपारा॥
नख आयुध गिरि पादपधारी।
चले गगन महि केहरिनाद भारी॥
भालु कपि करहीं चिक्करहीं।
डगमगाहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर धावहीं॥
कटकटहि मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह गावहीं॥
चौपाई
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहि मोहई॥
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥ १॥
दोहा
३५
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहें तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५ ॥
चौपाई
३५
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका।
जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा।
नहि निसिचर कुल केर उबारा॥
जासु दूत बल बरनि न जाई।
तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी।
मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी।
बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू।
मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥
समुझत जासु दूत कइ करनी।
स्त्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई।
पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई।
सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें।
हित न तुम्हार संधु अज कीन्हें॥
दोहा
३६
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ ३६ ॥
चौपाई
३६
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी।
बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा।
मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
जौं आवड़ मर्कट कटकाई।
जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहि लोकप जाकीं त्रासा।
तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई।
चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयै कर चिंता।
भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
बैठेउ साँ खबरि असि पाई।
सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू।
ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं।
नर बानर केहि लेखे माहीं॥
दोहा
३७
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहि भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३७ ॥
चौपाई
३७
सोइ रावन कहूँ बनी सहाई।
अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा।
भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन।
बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहिं बाता।
मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥
जो आपन चाहै कल्याना।
सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं।
तजउ चउथि के बंद कि नाई॥
चौदह भुवन एक पति होई।
भूतद्रोह तिष्ठइ नहि सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ।
अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥
दोहा
३८
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहि जेहि संत॥ ३८ ॥
चौपाई
३८
तात राम नहिं नर भूपाला।
भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज गो द्विज धेनु देव हितकारी।
कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल नाता।
बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा।
प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही।
भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा।
बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन।
सोइ प्रभु प्रगट समुझ जियँ रावन॥
दो बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
दोहा
३९ (क)
परिहरि मान मोह मद भजहु मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥ ३९ (ख) ॥
चौपाई
३९
माल्यवंत अति सचिव सयाना।
तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन।
सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ।
दूरि न करहु इहाँ हड़ कोऊ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी।
कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
सुमति कुमति सब के उर रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी।
तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥
दोहा
४०
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४० ॥
चौपाई
४०
बुध पुरान श्रुति संमत बानी।
कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई।
खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं।
भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा।
अनुज गहे पद बारहि बारा॥
उमा संत कड़ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहि मोहि मारा।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ।
सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥
दोहा
४१
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ ४१ ॥
चौपाई
४१
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।
आयूहीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी।
कर कल्यान अखिल कै हानी॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा।
भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं।
करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी।
दंडक कानन पावनकारी॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए।
कपट कुरंग संग घर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई।
अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥
दोहा
४२
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४२ ॥
चौपाई
४२
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा।
आयउ सपदि सिंधु एहि पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा।
जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
ताहि राखि कपीस पहि आए।
समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई।
आवा मिलन दसानन भाई॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा।
कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया।
कामरूप केहि कारन आया॥
भेद हमार लेन सठ आवा।
राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी।
मम पन सरनागत भयहारी॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
सरनागत बच्छल भगवाना॥
दोहा
४३
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४३ ॥
चौपाई
४३
कोटि बित्र बध लागहिं जाहू।
आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ।
भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई।
मोरें सनमुख आव कि सोई॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा।
तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते।
लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं।
रखिहउँ ताहि प्रान की नाई॥
दोहा
४४
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ ४४ ॥
चौपाई
४४
सादर तेहि आगें करि बानर।
चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥