सोने से पहले या निशिता काल में जपे जाने पर ये पाँच मंत्र भय, नकारात्मकता और अशांति को दूर कर मन को गहरी शांति प्रदान करते हैं।
रात्रि — विशेषकर प्रदोष-काल (सूर्यास्त के डेढ़ घंटे भीतर) और निशिता काल (मध्य-रात्रि) — को शिव-साधना के लिए विशेष शुभ माना जाता है, क्योंकि यह समय शिव के तमोगुण-प्रधान, ध्यान-प्रधान स्वरूप से जुड़ा है। नीचे दिए गए पाँचों मंत्रों में से एक या अधिक को सोने से पहले शांत मन से जपें।
हम त्रिनेत्रधारी, सुगंधित एवं सबका पोषण करने वाले शिव की उपासना करते हैं। जिस प्रकार पका हुआ फल बेल से अपने आप अलग हो जाता है, उसी प्रकार वे हमें मृत्यु और भय के बंधन से मुक्त कर अमरता की ओर ले जाएँ।
रात्रि-लाभ
सोने से पहले 11 या 108 बार जप करने से भय, रोग-भय और बुरे स्वप्नों से रक्षा होती है; दीर्घायु व आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है।
जिनके गले में सर्पों की माला है, जो तीन नेत्रों वाले हैं, भस्म जिनके अंगों पर सुशोभित है, जो महेश्वर, नित्य, शुद्ध और दिगम्बर (आकाश ही जिनका वस्त्र है) हैं — उस 'न' अक्षर से समन्वित शिव को नमस्कार है। यह आदि शंकराचार्य रचित पंचाक्षर स्तोत्र का पहला श्लोक है — पाँच श्लोकों में 'न-म-शि-वा-य' के पाँचों अक्षरों की महिमा गाई गई है।
रात्रि-लाभ
सोने से पहले इस स्तोत्र के पाँचों श्लोकों का पाठ शिव के पंचतत्व-स्वरूप के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव जगाता है, जिससे मन शांत और स्थिर होता है।
जिनकी जटाओं के वन से गिरती गंगाजल की धारा से कंठ पवित्र है, जिनके गले में ऊँची नाग-माला लटकती है — डमड् डमड् डमड् डमड् की ध्वनि से डमरू बजाते हुए जिन्होंने चण्ड-ताण्डव किया — वे शिव हमें कल्याण प्रदान करें। रावण-विरचित यह स्तोत्र १७ श्लोकों का है और साहस, निर्भयता व शिव-कृपा के लिए विशेष प्रभावशाली माना जाता है।
रात्रि-लाभ
प्रदोष-काल या रात्रि में इसका पाठ भय और आत्म-संदेह को दूर कर साहस व आत्मविश्वास जगाता है — इसकी वेगवान लय मन की जड़ता को तोड़ने में सहायक मानी जाती है।
Brahma-murāri-surārcita-liṅgaṃ nirmala-bhāsita-śobhita-liṅgam | Janma-ja-duḥkha-vināśaka-liṅgaṃ tat praṇamāmi sadāśiva-liṅgam
अर्थ
ब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और समस्त देवताओं द्वारा पूजित यह लिंग निर्मल प्रकाश से सुशोभित है और जन्म-जन्मांतर के दुःखों का नाश करने वाला है — उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। यह आदि शंकराचार्य रचित लिंगाष्टकम् का प्रथम श्लोक है, जो शिवलिंग की महिमा का वर्णन आठ श्लोकों में करता है।
रात्रि-लाभ
शिवलिंग-पूजा और लिंगाष्टकम्-पाठ पारंपरिक रूप से प्रदोष-काल (सूर्यास्त के बाद) में किया जाता है — दिन और रात्रि के इस संधि-काल में पाठ करने से मनोकामना-पूर्ति व मानसिक शांति का फल मिलता है।
शिव कैलाशों के वासी, धौली धारों के राजा,
शंकर संकट हरना॥
Shiv Kailashon Ke Vasi, Dhauli Dharon Ke Raja, Shankar Sankat Harna
भाव
यह कोई वैदिक मंत्र नहीं बल्कि सदियों पुराना लोक-भजन है — हिमालय की धवल (बर्फ़ीली) चोटियों के राजा, कैलाश-निवासी शिव को स्मरण करते हुए उनसे संकट-हरण की प्रार्थना की जाती है। भजन में शिव के भोलेपन, वैराग्य (बेल-पत्र, भांग-धतूरा) और करुणा का सरल, आत्मीय वर्णन है।
रात्रि-लाभ
रात्रि में सत्संग या अकेले में गुनगुनाया गया यह भजन मन को हल्का करता है और भय की जगह शिव के प्रति आत्मीय, भरोसे का भाव जगाता है — विशेषकर उदासी या चिंता की रातों में सहायक माना जाता है।
रात्रि में शिव-जप के लिए दो समय विशेष शुभ माने जाते हैं — प्रदोष-काल (सूर्यास्त के बाद डेढ़ घंटे के भीतर) और निशिता काल (रात्रि का मध्य-भाग, लगभग 12 बजे के आसपास)। इन दोनों समयों में वातावरण शांत रहता है और मन आसानी से एकाग्र होता है, जिससे मंत्र-जप अधिक प्रभावी माना जाता है। यदि यह समय संभव न हो तो सोने से ठीक पहले का समय भी उपयुक्त है।
रात्रि में शिव-मंत्र जप से मन की चंचलता शांत होती है, दिनभर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और नींद गहरी व सुखद आती है। मान्यता है कि यह भय, बुरे स्वप्न और अनिद्रा से रक्षा करता है, तथा अगली सुबह मन को स्थिर व सकारात्मक बनाता है। महामृत्युंजय जैसे मंत्रों को दीर्घायु और आरोग्य के लिए विशेष प्रभावशाली माना जाता है।
परंपरा के अनुसार शिव-मंत्र जाप के समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके, स्वच्छ और शांत स्थान पर आसन बिछाकर बैठना शुभ माना जाता है। पद्मासन या सुखासन में रीढ़ सीधी रखकर बैठने से मन जल्दी एकाग्र होता है।
यदि केवल एक ही मंत्र चुनना हो तो "ॐ नमः शिवाय" (पंचाक्षर मंत्र) सबसे सरल और सर्वसुलभ माना जाता है — इसे बिना किसी विशेष विधि के मानसिक रूप से भी जपा जा सकता है। भय, रोग या असुरक्षा की स्थिति में महामृत्युंजय मंत्र या शिव बीज मंत्र (ॐ हौं जूं सः) विशेष प्रभावशाली माने जाते हैं।
हाँ, "ॐ नमः शिवाय", महामृत्युंजय मंत्र और रुद्र गायत्री जैसे सामान्य शिव-मंत्र किसी भी श्रद्धालु द्वारा बिना औपचारिक गुरु-दीक्षा के जपे जा सकते हैं — इन्हें शास्त्रों में सर्वजन-सुलभ मंत्र कहा गया है। हालाँकि तांत्रिक बीज मंत्रों (जैसे विशेष सिद्धि-प्रयोगों) के लिए योग्य गुरु का मार्गदर्शन उचित माना जाता है।
पारंपरिक जाप-माला में 108 मनके होते हैं (109वाँ सुमेरु/गुरु-मनका होता है, जिसे लांघा नहीं जाता)। रुद्राक्ष की माला को शिव-मंत्रों के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। एक माला यानी 108 बार जप को एक "माला" कहा जाता है — शुरुआत में 1 माला रोज़ पर्याप्त है, समय के साथ 3, 5 या 11 माला तक बढ़ाया जा सकता है।