अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष

अजा एकादशी 2026

7 सितंबर, सोमवार — पाप-नाशिनी एकादशी

अंतिम अपडेट: 6 सितंबर 2026 · तिथि-समय पुनः सत्यापित
व्रत तिथि7 सितंबर 2026 (सोमवार)
एकादशी तिथि प्रारम्भ6 सितंबर, शाम 07:29 बजे
एकादशी तिथि समाप्त7 सितंबर, शाम 05:03 बजे
पारण8 सितंबर, सुबह 06:24-09:02 बजे

* तिथि-समय नई दिल्ली/भारत के पंचांग के आधार पर दिए गए हैं। अन्य शहरों में सूर्योदय के अंतर के कारण समय थोड़ा बदल सकता है। पारण से पहले स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है, जिसे कहीं-कहीं अन्नदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में इसे समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाली एकादशी बताया गया है। यह व्रत सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र की उस कथा से जुड़ा है, जो जीवन के सबसे कठिन समय में भी सत्य और धैर्य का साथ न छोड़ने की शिक्षा देती है।

एक स्पष्टीकरण: अजा एकादशी की कथा उसी परम्परा में आती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण (मधुसूदन) युधिष्ठिर को प्रत्येक एकादशी का माहात्म्य सुनाते हैं। नीचे राजा हरिश्चंद्र का प्रसंग उसी क्रम में प्रस्तुत किया गया है।
कथा

श्री अजा एकादशी की कथा

धर्मराज युधिष्ठिर का प्रश्न

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, तथा उसकी विधि व माहात्म्य क्या है। भगवान मधुसूदन ने उत्तर दिया कि इस एकादशी का नाम 'अजा' है, और यह समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाली है — जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश की पूजा करता है, उसे निश्चय ही वैकुंठ की प्राप्ति होती है। फिर उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनानी आरम्भ की।

राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा

श्रीराम के वंश में अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा और वचन-पालन के लिए त्रिलोक में प्रसिद्ध थे। उनकी परीक्षा लेने के लिए देवताओं ने एक योजना बनाई, और महर्षि विश्वामित्र स्वयं इसे परखने निकल पड़े।

विश्वामित्र की परीक्षा और राज्य का त्याग

राजा ने स्वप्न में देखा कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण राजपाट विश्वामित्र को दान कर दिया है। प्रातःकाल विश्वामित्र स्वयं द्वार पर आ पहुँचे और उसी दान की माँग की। सत्य-प्रतिज्ञ राजा हरिश्चंद्र ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सम्पूर्ण राज्य ऋषि को सौंप दिया। दान की दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को अपनी पत्नी तारामती, पुत्र रोहिताश्व और अंततः स्वयं को भी बेचना पड़ा।

काशी में चांडाल की सेवा

राजा हरिश्चंद्र एक चांडाल के सेवक बन गए और काशी के श्मशान घाट पर मृतकों से शुल्क व कफ़न लेने का कार्य करने लगे। राजसी वैभव त्यागकर इस अत्यंत विषम स्थिति में भी उन्होंने सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।

पुत्र की मृत्यु और तारामती से भेंट

कुछ समय पश्चात् सर्पदंश से पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु हो गई। शोकाकुल तारामती जब पुत्र का दाह-संस्कार करने उसी श्मशान घाट पर पहुँचीं, तो उन्हें वहाँ कर वसूलने वाले सेवक के रूप में स्वयं अपने पति हरिश्चंद्र मिले। नियमानुसार कर चुकाए बिना संस्कार सम्भव न था — यह दृश्य राजा की सत्यनिष्ठा की सबसे कठिन परीक्षा थी, फिर भी उन्होंने कर्तव्य-पालन में कोई ढिलाई नहीं की।

ऋषि का उपदेश — अजा एकादशी व्रत

इसी संकटपूर्ण समय में एक महर्षि ने राजा को दर्शन देकर बताया कि ठीक सात दिन बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी आने वाली है, और यदि वे पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत रखकर रात्रि-जागरण करें, तो उनके समस्त कष्ट अवश्य दूर हो जाएँगे। राजा हरिश्चंद्र ने ऋषि के वचनानुसार अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी विधिपूर्वक व्रत रखा और रात्रि में भगवद्-कीर्तन किया।

व्रत का फल — राज्य, परिवार व पुत्र की पुनःप्राप्ति

व्रत पूर्ण होते ही आकाश से पुष्प-वर्षा हुई और स्वयं भगवान विष्णु राजा के समक्ष प्रकट हुए। भगवान की कृपा से मृत पुत्र रोहिताश्व पुनः जीवित हो उठे, पत्नी तारामती लौट आईं और राजा को उनका खोया हुआ सम्पूर्ण राज्य व सम्मान भी पुनः प्राप्त हो गया। अंत में राजा अपने परिवार सहित सुखपूर्वक अयोध्या लौटे।

कथा का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो भी अजा एकादशी का माहात्म्य श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है, उसके पापों का क्षय होने की धार्मिक मान्यता है। यह कथा सिखाती है कि जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी सत्य, धैर्य और भगवद्-भक्ति का साथ न छोड़ने वाले को अंततः श्रीहरि की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

पूजा विधि

अजा एकादशी पूजा विधि

  1. प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ (संभव हो तो पीले) वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  2. घर के पूजा-स्थान को स्वच्छ कर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
  3. भगवान को पीले वस्त्र, पंचामृत, ऋतु फल और पीला चंदन अर्पित करें।
  4. तुलसीदल भी अर्पित करें — ध्यान रहे, ये पत्ते एक दिन पहले (दशमी तिथि को) ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित है।
  5. षोडशोपचार पूजन करें — धूप, घी का दीपक, नैवेद्य, आरती के साथ।
  6. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  7. अजा एकादशी की व्रत-कथा (राजा हरिश्चंद्र प्रसंग) सुनें/पढ़ें।
  8. निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखें (क्षमता अनुसार) और रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करें।
  9. अगले दिन (पारण दिवस) शास्त्रोक्त मुहूर्त में ही व्रत खोलें, दान व सेवा करें।

तिथि व समय (2026)

विवरणतिथि / समय
एकादशी तिथि प्रारम्भ6 सितंबर 2026, शाम 07:29 बजे
एकादशी तिथि समाप्त7 सितंबर 2026, शाम 05:03 बजे
व्रत की तिथि7 सितंबर 2026 (सोमवार)
पारण (व्रत खोलना)8 सितंबर 2026, सुबह 06:24 से 09:02 बजे के बीच
मास एवं पक्षभाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष

तिथि-समय स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकता है। पारण से पूर्व अपने शहर का स्थानीय पंचांग अवश्य जाँच लें।

प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

अजा एकादशी 2026 में कब है?

अजा एकादशी 7 सितंबर 2026, सोमवार को है। एकादशी तिथि 6 सितंबर को शाम 07:29 बजे आरम्भ होकर 7 सितंबर को शाम 05:03 बजे समाप्त होगी। पारण 8 सितंबर को सुबह 06:24 से 09:02 बजे के बीच होगा।

अजा एकादशी की व्रत कथा किससे जुड़ी है?

यह कथा सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी है, जिन्होंने विश्वामित्र की परीक्षा में अपना राज्य, पत्नी तारामती और पुत्र रोहिताश्व तक त्याग दिया, फिर भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। अजा एकादशी व्रत के प्रभाव से उन्हें अपना पुत्र, पत्नी और राज्य पुनः प्राप्त हुए।

अजा एकादशी का व्रत करने से क्या फल मिलता है?

शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाली है। श्रद्धापूर्वक व्रत व रात्रि-जागरण करने वाले भक्त को भगवान ऋषिकेश की कृपा से वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

अजा एकादशी पर तुलसी पूजन में क्या ध्यान रखें?

एकादशी तिथि को तुलसी दल तोड़ना वर्जित माना गया है, इसलिए पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले, दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेने चाहिए।

अजा एकादशी किस मास व पक्ष में आती है?

अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आती है। इसे अन्नदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

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