भगवान वामन राजा बलि, परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष

परिवर्तिनी एकादशी 2026

22 सितंबर, मंगलवार — भगवान विष्णु की करवट-लीला व वामन अवतार कथा

व्रत तिथि22 सितंबर 2026 (मंगलवार)
एकादशी तिथि प्रारम्भ21 सितंबर, रात 08:01 बजे
एकादशी तिथि समाप्त22 सितंबर, रात 09:43 बजे
पारण23 सितंबर, सुबह 06:10–08:35 बजे

* सटीक समय स्थान (सूर्योदय) के अनुसार भिन्न हो सकता है — अपने स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है, जिसे वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि चातुर्मास की योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान विष्णु इसी दिन करवट (परिवर्तन) बदलते हैं। यह एकादशी दानवीर राजा बलि और भगवान के वामन अवतार की कथा से जुड़ी है, जो त्याग, भक्ति और विनम्रता की शिक्षा देती है।

एक स्पष्टीकरण: परिवर्तिनी एकादशी की कथा भी उसी परम्परा में आती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को एकादशी माहात्म्य सुनाते हैं। नीचे राजा बलि व वामन अवतार का प्रसंग उसी क्रम में प्रस्तुत किया गया है।
कथा

श्री परिवर्तिनी एकादशी की कथा

धर्मराज युधिष्ठिर का प्रश्न

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से भाद्रपद शुक्ल एकादशी का नाम व माहात्म्य पूछा। भगवान ने बताया कि इसे परिवर्तिनी अथवा वामन एकादशी कहा जाता है, और इसका व्रत करने से वामन अवतार की पूजा के समान ही पुण्य प्राप्त होता है।

दानवीर राजा बलि का उदय

असुरराज बलि अत्यंत पराक्रमी, दानी और भगवद्भक्त थे। अपने तप व पुण्य के बल पर उन्होंने इंद्र सहित तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया, जिससे देवगण चिंतित होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।

वामन अवतार की लीला

देवताओं की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने एक छोटे ब्रह्मचारी वामन का रूप धारण किया और राजा बलि के यज्ञ में पहुँचे। भगवान ने दान में केवल तीन पग भूमि माँगी। गुरु शुक्राचार्य की चेतावनी के बावजूद, राजा बलि ने अपनी वचनबद्धता व उदारता के कारण यह संकल्प सहर्ष स्वीकार कर लिया।

त्रिविक्रम रूप व तीन पग

संकल्प पूर्ण होते ही भगवान ने विराट त्रिविक्रम रूप धारण कर लिया। पहले पग में सम्पूर्ण पृथ्वी और दूसरे पग में सम्पूर्ण स्वर्गलोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए जब कहीं स्थान शेष न बचा, तो राजा बलि ने विनम्रतापूर्वक अपना सिर आगे कर दिया, जिस पर भगवान ने तीसरा पग रखा।

भगवान का वचन व बलि को पाताल-अधिपति बनाना

राजा बलि की अद्वितीय भक्ति, त्याग और विनम्रता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया तथा वचन दिया कि वे सदैव उनके द्वारपाल के रूप में उनके समीप रहेंगे। इसी वैष्णव परम्परा में यह भी कहा जाता है कि भगवान अपने एक स्वरूप से बलि के साथ रहते हैं और दूसरे स्वरूप से क्षीरसागर में योगनिद्रा में करवट बदलते रहते हैं — इसी करवट-लीला से इस एकादशी का नाम परिवर्तिनी पड़ा।

कथा का संदेश

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो भी श्रद्धापूर्वक परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखता है और यह कथा सुनता है, उसके मन, वचन व कर्म से हुए त्रिविध पाप नष्ट हो जाते हैं। राजा बलि का प्रसंग सिखाता है कि सच्चा दान व समर्पण सर्वस्व त्यागकर भी भगवद्-कृपा दिला सकता है।

पूजा विधि

परिवर्तिनी एकादशी पूजा विधि

  1. प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ (संभव हो तो पीले) वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  2. घर के पूजा-स्थान को स्वच्छ कर भगवान वामन/विष्णु व माता लक्ष्मी की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
  3. भगवान को पीले वस्त्र, तुलसीदल, पंचामृत और फल अर्पित करें।
  4. षोडशोपचार पूजन करें — धूप, दीप, नैवेद्य, आरती के साथ।
  5. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" अथवा "ॐ वामनाय नमः" मंत्र का जप करें।
  6. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और परिवर्तिनी एकादशी की व्रत-कथा (राजा बलि-वामन प्रसंग) सुनें/पढ़ें।
  7. निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखें (क्षमता अनुसार) और रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करें।
  8. अगले दिन (पारण दिवस) शास्त्रोक्त मुहूर्त में ही व्रत खोलें, दान व सेवा करें।

तिथि व समय (2026)

विवरणतिथि / समय
एकादशी तिथि प्रारम्भ21 सितंबर 2026, रात 08:01 बजे
एकादशी तिथि समाप्त22 सितंबर 2026, रात 09:43 बजे
व्रत की तिथि22 सितंबर 2026 (मंगलवार)
पारण (व्रत खोलना)23 सितंबर 2026, सुबह 06:10 से 08:35 बजे के बीच
मास एवं पक्षभाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष

सटीक घंटे-मिनट स्थानीय सूर्योदय पर निर्भर करते हैं — पारण से पूर्व अपने शहर का पंचांग अवश्य जाँच लें।

प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

परिवर्तिनी एकादशी 2026 में कब है?

परिवर्तिनी एकादशी 22 सितंबर 2026, मंगलवार को है। एकादशी तिथि 21 सितंबर को रात 08:01 बजे आरम्भ होकर 22 सितंबर को रात 09:43 बजे समाप्त होगी। पारण 23 सितंबर को सुबह 06:10 से 08:35 बजे के बीच होगा।

परिवर्तिनी एकादशी को यह नाम क्यों दिया गया?

मान्यता है कि चातुर्मास की योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु इस दिन करवट (परिवर्तन) बदलते हैं, इसीलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा किससे जुड़ी है?

यह कथा दानवीर राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। भगवान ने तीन पग भूमि माँगकर तीनों लोक नाप लिए और राजा बलि की भक्ति देखकर उन्हें पाताल लोक का अधिपति बना दिया।

परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने से क्या फल मिलता है?

शास्त्रों के अनुसार इस व्रत से वामन अवतार की पूजा के समान पुण्य मिलता है और मनुष्य के त्रिविध पापों (मन, वचन, कर्म से हुए) का नाश होता है।

क्या परिवर्तिनी एकादशी चातुर्मास में आती है?

हाँ, यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में, चातुर्मास के मध्य आती है, इसीलिए इसका महत्व और भी विशेष माना गया है।

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